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Tuesday, 14 November 2017

नेहरूंच्या भारताला अमुल्य देणग्या...........!


गांधी नेहरुच्या  गुलामांनो आतातरी डोळे उघडा .........! 






प्रस्तुत दाखले हे महान लेखक डॉ. नी.र. वऱ्हाडपांडे यांची नेहरुवाद या पुस्तकातील असून हे पुस्तक माझ्याकडे आहे.... शिवाय हे लेखक ९४ वर्षांचे होऊन गेल्या वर्षी निर्वतले .... रक्षा मंत्रालयात सचिव स्तरावर यांनी नेहरुकालात खूप दीर्घ काम केलेले आहे... पुढे लेखकांचा परिचय देतो..त्यावरून त्यांचे अष्टपैलू व्यक्तिमत्व आणि महत्ता सिद्ध होते..........





Saturday, 11 November 2017

राजकारण : एक मृगजळ।

‬: हिटलर एक बार अपने साथ संसद में एक मुर्गा लेकर आये,
और सबके सामने उसका एक -एक पंख नोचने लगे,
 मुर्गा दर्द से बिलबिलाता रहा मगर,
एक-एक करके हिटलर ने सारे पंख नोच दिये,
 फिर मुर्गे को फर्श पर फेंक दिया,
फिर जेब से कुछ दाने निकालकर मुर्गे की तरफ फेंक दिए और चलने लगा,
तो मुर्गा दाना खाता हुआ हिटलर पीछे चलने लगा,
 हिटलर  बराबर दाना फेंकता गया और मुर्गा बराबर दाना मु्ँह में ड़ालता हुआ उसके पीछे चलता रहा।
आखिरकार वो मुर्गा हिटलर के पैरों में आ खड़ा हुआ।
हिटलर स्पीकर की तरफ देखा और एक तारीख़ी जुमला बोला,
"लोकतांत्रिक देशों की जनता इस मुर्गे की तरह होती है,
उनके हुकमरान जनता का पहले सब कुछ लूट कर उन्हें अपाहिज कर देते हैं,
और बाद में उन्हें थोड़ी सी खुराक देकर उनका मसीहा बन जाते हैं"।
*This is our position at present...*.
2019 के लिए तैयार रहें। बहुत जल्द जनता को दाने फेके जाएंगे।

30 दिसंबर, 1943: ब्रिटिशराज से भारत की घोषित आजादी का पहला दिन

: 30 दिसंबर, 1943: ब्रिटिशराज से भारत की घोषित आजादी का पहला दिन






एक ऐसा दिन जिसे भारतीय इतिहास के पन्नों से बिलकुल गुम सा कर दिया गया। स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले अमर क्रांतिकारियों की सफलता के इस दिन को क्या सरकार,क्या जनता और क्या मीडिया सभी ने पूरी विस्मृत कर दिया। किसी ने सच ही कहा है “इतिहास जंग याद रखता है शहीद नहीं।”
आज से ठीक 72 वर्ष पूर्व भारत के दक्षिणी-पूर्वी अंडमान निकोबार द्वीप समूह से देश की आजादी की घोषणा की गयी थी।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फ़ौज ने अंग्रेजों के कब्जे से पूर्वी भारत के कई द्वीपों को आजाद करवा लिया। और आज के ही दिन वहाँ भारत के प्रतिनिधिकर्ता के रूप में आजाद हिन्द फ़ौज के ध्वज को फहराया गया।
नेताजी के नेतृत्व में हुई अस्थाई भारत सरकार की घोषणा
5 जुलाई 1943 को आजाद हिन्द फ़ौज की कमान सँभालते ही सुभाषचंद्र बोस ने सेना से ‘दिल्ली’ कूच करने का आह्वाहन किया। पूर्वी भारत के कोहिमा और इम्फाल के रास्ते विजय अभियान के शुरुआत की गयी।






महीनो संघर्ष के बाद 21 अक्टूबर को अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी गयी।
अंततोगत्वा कई अन्य द्वीपों को मिलाकर 30 दिसंबर 1943 को इन द्वीपों पर भारतीय ध्वज फहरा कर आजाद भारतीय सरकार की घोषणा की गयी।
15 अगस्त 1947 को ‘दान’ और ‘कृपा’ में प्राप्त विभाजनकारी रक्तरंजित फव्वारों से लफेंदी आजादी से पूर्व दिसंबर 1943 में परतंत्र भारत के पहले आजाद क्षेत्र ‘स्वराज’ द्वीप को जापान,जर्मनी,कोरिया,फिलीपींस,इटली यहाँ तक की चीन सहित सभी पूर्वी एशियाई देशों ने मान्यता दे दी।
हालाँकि इनमें से ज्यादातर राष्ट्र ब्रिटिशों के विरोधी थे शायद इसीलिए भारतीय इतिहास के अंग्रेज लेखकों ने इस आजादी को ‘आजादी’ मानने से इंकार कर दिया। यह ऐसी जीत थी जो लड़कर और फिर जीतकर हाँसिल की गयी थी.चालीस हजार से ज्यादा वीर-वीरांगनाओ के शौर्य और बलिदान की वेदी से प्रस्फुटित पहली आजादी को इतिहास में इस ‘भेदभाव’ की दृष्टि से देखा जाएगा इसकी कल्पना सुभाष बाबू को कतई न रही होगी।




ये माना जा सकता है की ये आजादी पूर्ण नहीं थी और एक छोटे द्वीप समूह तक ही सीमित रह गयी थी। परन्तु यह ‘भीख’ भी नहीं थी इसे चापलूसी से नहीं वरन शौर्य और आत्मबल से प्राप्त किया गया था। इतिहास गवाह है की इसके बाद भी भारतीय शूरवीरों ने भारतमाता के स्वाधीनता के लिए प्रयास करते हुए अंग्रेजों पर जोरदार हमले किये। परन्तु अंग्रेजो के इंडियन एजेंट्स (जो की ‘नपुंसकत्व’ को अहिंसा करार दे रहे थे) ने इन रणबाँकुरों को सहयोग करने से मना कर दिया। इस प्रकार सुभाष बोस द्वारा स्वाभिमान से आजादी प्राप्त करने का सपना चूर-चूर हो गया।
अपने खून की कीमत पर भारत को आजाद करने की कसम खाने वाले देशभक्त योद्धाओं के योगदान को संकुचित राजनीति के तहत कागज़ के कुछ पन्नो में समेत दिया गया। ये वही महानतम योद्धा थे जिनके बारे में हिटलर कहता था की “यदि ये मेरे साथ हो जाएँ तो मै समूचे विश्व को जीत लूँगा।” हमारा दुर्भाग्य है की भारतीय इतिहास के इस सुनहरे अध्याय को आम भारतीय जनमानस से छुपा दिया गया वो भी इसलिए ताकी सुभाष बाबू और आजाद हिन्द फ़ौज को सिर्फ एक बाहरी सेना के रूप में दर्शाया जा


30 दिसंबर का दिन सहसत्राब्दियों से शौर्य और पराक्रम से युत भारतीय भूमि पर मढी हुई नपुंसकता और जड़ता के कलंक को धोने का दिन हैं। आज सुभाष बाबू और उनकी करिश्मायी सेना हमारे बीच नहीं है परन्तु उनका आत्मबल और तेज हमें आज भी प्रकाशित कर रहा है।

डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर और इस्लाम’*



डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर जी का भारत की राष्ट्रीय धारा का भरपूर अभ्यास था. उनके प्रबंध का  विषय ही था, ‘भारत के राष्ट्रीय लाभांश का इतिहासात्मक और विश्लेषणात्मक अध्ययन’ (The National Divident of India – A Historical and Analytical Study). अर्थात, भारत का इतिहास, उस इतिहास की विभिन्न सामाजिक धाराएं, उनमे आयी हुई विकृतियां, मुस्लिम आक्रांता, उन आक्रान्ताओंने किया हुआ विध्वंस, इन सभी विषयों पर बाबासाहब का गहरा अध्ययन था. और इन विषयों पर उन्होंने अपनी राय हमेशा ही बेबाक ढंग से रखी हैं.


२८ दिसंबर, १९४० को उनका Thought on Pakistan यह पुस्तक प्रकाशित हुआ. उस समय तक पाकिस्तान का मुद्दा गरमाया तो था, लेकिन राष्ट्रीय बहस का विषय नहीं बना था. पुस्तक प्रकाशित होने के समय दूसरा विश्वयुध्द प्रारंभ हो चुका था. इस पृष्ठभूमि पर इस पुस्तक में बाबासाहब ने इस्लाम और पकिस्तान के बारे में किसी की परवाह न करते हुए, निर्भीकता के साथ खरी खरी सुनायी हैं. *उन्होंने विभाजन का समर्थन किया हैं. इस्लाम से ‘छुटकारा’ पाने के लिए विभाजन कितना आवश्यक हैं, इस बात को बार बार दृढ़ता के साथ रखा हैं. मुसलमानों के साथ हिन्दुओं का सह अस्तित्व संभव ही नहीं हैं, इस बात को दमदारी के साथ प्रतिपादित किया हैं. और इसीलिए विभाजन के समय जनसंख्या के अदला-बदली की शर्त को वे अनिवार्य मानते हैं.*






महत्वपूर्ण बात यह हैं की बाद में हिन्दू-मुस्लिम दंगे, बटवारा, आजादी, संविधान का निर्माण इस सब प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद भी इस विषय पर उनकी सोच अडिग हैं. बिलकुल भी नहीं बदली हैं. बटवारे के समय जनसंख्या की अदला-बदली नहीं हो सकी हैं. इसके बावजूद भी बाबासाहब को विभाजन यह एक अच्छी घटना लग रही हैं.
*पाकिस्तान पर पुस्तक प्रकाशित होने के लगभग १५ वर्ष बाद लिखे एक लेख में बाबासाहब ने मुस्लिमों को ‘अभिशाप’ इस शब्द से संबोधित किया हैं.* महाराष्ट्र शासन द्वारा प्रकाशित उनके ‘Dr. Babasaheb Ambedkar – Writing and Speeches’ इस ग्रन्थ साहित्य के पहले खंड के १४६ वे पृष्ठ पर इस सन्दर्भ में बड़ा स्पष्ट उल्लेख हैं. बाबासाहब लिखते हैं - ”When partition took place, I felt that God was willing to lift his curse and let India be one, great and prosperous” (जब विभाजन हुआ, तब मुझे ऐसा लगा, मानो ईश्वर ने इस देश को दिया हुआ ‘अभिशाप’ वापस ले लिया हैं और अब अपने देश को एक रखने का, महान और समृध्दशाली बनने का रास्ता साफ़ हो गया हैं.)
यहां पर ‘अभिशाप’ यह शब्द किस अर्थ में प्रयोग किया गया हैं, यह स्पष्ट हैं. इस्लामी आक्रान्ताओं का इतिहास बाबासाहब को अच्छे से मालूम था. हिन्दू और बौध्द धर्मीय लोगों पर मुसलमानों ने किये हुए पाशविक और बर्बरतापूर्ण अत्याचारों का उनका जबरदस्त अध्ययन था. इन अत्याचारों का वे स्पष्टता के साथ उल्लेख भी कर रहे हैं. अर्थात ‘इस्लामी जनता से अलग होकर ही भारत का विकास हो सकता हैं’, यह उनकी मजबूत धारणा हैं.








ये आगे भी दिखाई देता हैं - उनकी मृत्यु से मात्र छह माह पहले, अर्थात २३ जून, १९५६ को दिल्ली में अखिल भारतीय बौध्दजन समिति के प्रकट सभा में बाबासाहब ने अपने यही विचार स्पष्टता से रखे हैं - “I was glad that India was seperated from Pakistan. I was the philosopher so to say, of Pakistan. I advocated Pakistan because I felt that it was only by partition that Hindus would not only be independent, but free.” 
अपने पाकिस्तान पर लिखे गए पुस्तक में ऊपर कही गयी सभी बातों का विस्तृत विवरण आता हैं. चुंकि बाबासाहब वकील थे, इसलिए उन्होंने ‘पाकिस्तान’ इस विषय के दोनों पक्षों का प्रतिपादन किया हैं.
‘मुस्लिम केस फॉर पाकिस्तान’ इस शीर्षक के अंतर्गत तीन अध्याय हैं. उनमे ‘मुस्लिम लीग की मांगे’, ‘राष्ट्र को घर चाहिए’ और ‘दुर्दशा से पलायन’ जैसे विषयों पर विस्तार से विवेचन किया हैं.
पुस्तक के अगले तीन अध्याय ‘हिन्दू केस अगेंस्ट पाकिस्तान’ इस शीर्षक के अंतर्गत हैं. ‘खंडित एकता’, सुरक्षा की दुर्बलता’ और पाकिस्तान तथा धार्मिक एकता’ इन विषयों द्वारा पाकिस्तान के निर्माण के विरोध में हिन्दू समाज के तर्कों को रखा गया हैं.






आगे ‘पाकिस्तान नहीं बना तो’ इस शीर्षक के अंतर्गत तीन अध्याय हैं. इसमें पाकिस्तान का विकल्प, हिन्दू और मुस्लिमों के दृष्टिकोण से दिया हैं.
अंतिम तीन अध्याय ‘पाकिस्तान के निर्माण की बेचैनी’ इस शीर्षक के अंतर्गत हैं. इनमे सामाजिक मुद्दे, जातिगत संघर्ष, राष्ट्रीय अवसाद आदि विषयों की चर्चा हैं. और सबसे अंत में पूरे पुस्तक का सार, संक्षेप में दिया हैं.




यह पुस्तक अनेक अर्थों में महत्वपूर्ण हैं. यह पुस्तक किसी हिन्दुत्ववादी चिन्तक ने लिखी हुई नहीं हैं. वरन बाबासाहब जैसे अत्यंत कुशाग्र बुध्दी के व्यक्ति ने, हिन्दू - मुस्लिम मसले के सभी पहलुओं पर सारगर्भित विचार कर यह पुस्तक लिखी हैं. इसलिए यह एकपक्षीय होने का प्रश्न ही नहीं उठता. बाबासाहब ने अनेकों बार हिन्दू धर्म पर प्रखर टिप्पणी की हैं. इसलिए ऐसे हिन्दू समाज के पक्षधर न रहने वाले व्यक्ति ने, संविधान के निर्माता ने यह ग्रन्थ लिखा हैं, यह महत्वपूर्ण हैं.
*इस पुस्तक में बाबासाहब लिखते हैं – “ भारत में हिन्दू – मुस्लिम एकता कभी अस्तित्व में ही नहीं थी.* मुसलमान शासक के रूप में भारत में आये थे, इसलिए वे इसी मानसिकता में रहते हैं. १८५७ का विद्रोह भी हिन्दू – मुस्लिम एकता का प्रतीक नहीं था, वरन मुसलमानों ने अपनी ‘छिनी गयी’ शासक की भूमिका को फिर से वापस लेने के लिए अंग्रेजों से छेड़ा विद्रोह था.”
*बाबासाहब मुस्लिम धर्म के बारे में भी विस्तार से लिखते हैं, “मुसलमानों में समता नहीं हैं. इस धर्म में महिलाओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया जाता. मुसलमानों के अलावा वें सभी को काफिर मानते हैं. और ‘मुसलमानों के देश में / समाज में काफिरों के साथ दोयम दर्जे का हीन व्यवहार होना चाहिए’ यह उनके धर्म में ही लिखा हैं.”* इस सन्दर्भ में बाबासाहब ने अनेक उदाहरण दिए हैं. तैमुरलंग की मिसाल देकर वे बताते हैं की उसने कैसे पाशविक अत्याचार हिन्दुओं पर किये थे.
तो फिर ऐसे मुसलमानों के साथ हिन्दुओं की एकता संभव हैं क्या..? अगर हैं, तो कैसे..?








इस बारे में पुस्तक के अंत में बाबासाहब लिखते हैं, “हिन्दू – मुस्लिम एकता यह ‘तुष्टिकरण’ (appeasement) या ‘समझौता’ (settlement) इन दो ही रास्तों से संभव हैं. (If Hindu – Moslem unity is possible, should it be reached by appeasement or settlement..? – Chapter IV, Page 264).
इसमें उल्लेख किया गया तुष्टिकरण (appeasement) यह शब्द बाबासाहब ने मुसलमानों के सन्दर्भ में अनेकों बार प्रयोग किया हैं. *‘कांग्रेस पार्टी मुसलमानों का तुष्टिकरण करती हैं, जो देश के लिए घातक हैं’,* यह कहते हुए बाबासाहब लिखते हैं - Congress has failed to realize is the fact that there is a difference between appeasement and settlement and that the difference is an essential one (Chapter IV, Page 264).
इसी अध्याय में बाबासाहब ‘तुष्टिकरण’ इस शब्द की व्याख्या करते हैं. वे लिखते हैं, “तुष्टीकरण याने आक्रान्ता का दिल जितने के लिए उसने किये हुए खून, बलात्कार, चोरी, डकैती आदि को अनदेखा करना” (Appeasement means to offer to buy off the aggressor bu convincing at or collaborating with him in the rape, murder and arson on innocent Hindus, who happen for the moment to be the victims of his displeasure).
अर्थात ‘कितना भी तुष्टिकरण किया जाय, आक्रांता का कितना भी अनुनय किया जाय, उनकी मांगों का कोई अंत नहीं होता...’








बाबासाहब ने बड़े ही आग्रह के साथ लोकसंख्या के अदला-बदली को प्रतिपादित किया हैं. ‘पूर्व और पश्चिम पाकिस्तान में सभी मुसलमान और हिंदुस्तान में सभी हिन्दू’ यह उनकी पक्की सोच हैं. और पूरी आस्था के साथ उन्होंने अपनी इस राय को बार बार दोहराया हैं.
बाबासाहब की यह राय आगे भी कायम रही हैं. भारत स्वतंत्रता के दहलीज पर हैं, और ऐसे समय, २० जुलाई, १९४७ में प्रकाशित अपने वक्तव्य में बाबासाहब कहते हैं – “बंगाल और पंजाब का विभाजन यह केवल उन प्रान्तों के निवासियों का प्रश्न नहीं हैं. यह राष्ट्रीय प्रश्न हैं. इन प्रान्तों की सीमा रेषा तय करना यह सुरक्षा और व्यवस्थापन इन मुद्दों के आधार पर ही संभव हैं. जनसंख्या के अदला-बदली को यदी कांग्रेस और लीग मानती, तो यह समस्या खड़ी ही नहीं होती. (खंड १७, पृष्ठ ३५५)
बाबासाहब ने १९३६ में धर्मांतर की घोषणा की. घोषणा के पहले और बाद में उन्होंने विभिन्न धर्मोंका बारीकी से अध्ययन किया. इस दौरान हैदराबाद रियासत के नवाब ने उन्हें मुस्लिम धर्म में आने के लिए कुछ करोड़ रुपये पेश किये. (संदर्भ – धनंजय कीर द्वारा लिखित बाबासाहेब आंबेडकर चरित्र) किन्तु बाबासाहब ने यह पेशकश ठुकरा दी.
बाद में बाबासाहब का झुकाव बौध्द धर्म के पक्ष में होने पर उन्होंने ‘बौध्द और इस्लाम’ संबंधों पर विस्तार से लिखा हैं. *इस्लामी आक्रान्ताओं ने कितनी बर्बरता से बौध्द भिक्खुओं को मौत के घाट उतारा, बौध्द विहारों को उध्वस्त किया, इस बारे में बाबासाहब लिखते हैं, “इस्लाम में ‘बुत शिकन’ यह सम्मान से बोला जाने वाला शब्द हैं. इसका अर्थ हैं, ‘मूर्ती फोड़ने वाला’. इसमें जो ‘बुत’ हैं, वह ‘बुध्द’ शब्द का अपभ्रंश (परिवर्तित रूप) हैं.” ‘बौध्द धर्म को समाप्त करने में मुस्लिम आक्रान्ताओं की भूमिका प्रमुख हैं’, ऐसा बाबासाहब ने अनेक स्थानों पर लिखा हैं.*








इस्लाम और पाकिस्तान के बारे में बाबासाहब की सोच ऐसे सीधी, सरल और सपाट हैं. एकदम स्पष्ट. कही कोई संभ्रमावस्था नहीं हैं. जीवन के अलग अलग मुकाम पर भूमिका बदलनेका भी प्रयास नहीं हैं. ‘हिन्दू – मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते इसलिए विभाजन आवश्यक हैं’ ऐसा स्पष्ट प्रतिपादन.
हम बाबासाहब की विभाजन की भूमिका से सहमत होंगे या नहीं होंगे. किन्तु उनकी दूरदृष्टि और सोच की स्पष्टता देखकर मन अचंभित रह जाता हैं..! 





 - प्रशांत पोल

Monday, 21 November 2016

खिलजी ते तुघलक मार्गे फसलेल फसलेल स्वातंत्र्



TAKEN FROM ORKUT

इ.स.१३२० मध्ये दिल्लीचे खिलजी घराणे जाऊन तुघलक घराणे आले. या
सत्तांतराच्या दरम्यान भारतीयांच्या एका गटाने परकिय आक्रमक
राष्ट्राविरुद्ध केलेल्या फसलेल्या क्रांतीची घटना समाविष्ट असून फार थोडया
लोकांना या इतिहासाची माहिती असते. तुगलक घराण्याचा वेडा महंमद बहुतेकांना
माहिती असतो. गिरिश कर्नाड यांचे "तुघलक" हे एक प्रख्यात
नाटकही आहे. "अल्लाउद्दीन खिलजी व महाराणी पद्मिनी " यातून उभ्या
राहिलेल्या संघर्षाची कथा,नाटक,सिनेमा रुपी कलात्मक माहिती येऊन गेली आहे.
मराठीत याच काळावर अल्लाउद्दीन खिलजी च्या दरबारातील अमीर खुस्रो व दक्षिणी गायक कलाकार गोपाळ नायक यांच्यातील गायन जुगलबंदीची मध्यवर्ति कथा कल्पून
"देवगिरी बिलावल " या
नावे एक कादंबरीही २०-२५ वर्षांपूर्वी वाचलेली आठवते.गोपाळ नायक या महान
भारतीय गायकाने अमीर खुस्रो याला यशस्वी टक्कर दिली. अमीर खुस्रो ने गोपाळ
नायकांना हरवण्याचा प्रयत्न केला पण श्रुती, ग्राम,मुर्धना ,जाति  मुर्धना
इ. शास्त्रीय संगीताची वैषिष्ट्ये कशाशी खातात हे त्याला शेवटपर्यंत कळले
नाही.तरिही अमीत्र खुस्रोच्या नंतरच्या इराणी संगीतज्ञाने काही राग खुशाल
अमीर खुस्रोच्या नावावर दडपुन दिले आहेत.




मात्र या
सत्तांतराच्या काळात गुजरात च्या भारवाड या एका लढाऊ जमातीने दिल्लीचे तख्त
परत ताब्यात घेतले होते व तब्बल सहा महिने भारतीय राज्याची पुनर्स्थापना
केली होती या रोमहर्षक इतिहासावर फारसा कोणी प्रकाश टाकलेला नाही. केवळ
स्वा.सावरकरांनी एक स्वतंत्र प्रकरणच या विषयावर लिहिलेले आहे. मात्र "सहा
सोनेरी पाने  " हे इतिहासलेखन किंवा नाट्य-काव्यशास्त्र विनोद याची कलाकृती
नसून इतिहास समिक्षा असल्याने त्यात बरेच तपशील आलेले नाहीत.(सहा सोनेरी
पाने चे इंग्लिश भाषांतर करणारे कै.श्री.श्री.त्र्यं.गोडबोले यांचे एक
अप्रकाशित नाटकही याच विषयावर आहे ते "प्रज्वलंत" मासिकातून प्रसिद्ध
झाल्याचे आठवते )गुजराथीत " करण घेलो" या नावाची याच काळावर एक कादंबरी
आहे. मी कॉलेजमध्ये असताना यावरच एक ऐतिहासिक कादंबरी लिहिण्याचा
अव्यापारेषु व्यापार केला होता.




Kaustubh Gurav - 6 de julho de 2013 - denunciar abuso
परंतु एकंदरीत एका बाटवल्या गेलेल्या अत्याचारीत भारतीयाने
गुलामीतून बाहेर पडून तब्बल सहा महिने परत स्वतंत्र भारतीय सिंहासन स्थापित
केले होते या रोमहर्षक कथानकाची भुरळ अन्य कोणत्या इतिहासकार,नाटककार,कथा-कादंबरीकार यांना पडू नये याचे
आश्चर्य वाटते. अर्थात यात आश्चर्य करण्यासारखे काहीच नाहिही ! कारण
बहुतेक आक्रमक धर्मांध तवारिखकारांनी या भारतीय वीरांची अत्यंत तीव्र
शब्दात निर्भत्सना करुन शिव्या शापांची लाखोली वाहिली असल्याने परकियांच्या ओंजळीने पाणी पिणार्या , अस्मिता गमावलेल्या भारतीय इतिहासकारांनी व कथा-कादंबरीकारांनी त्यांचीच रि ओढली आहे. याला काही अपवाद असले तरी ते स्वत:च्याच निष्कर्षांना भीत भित त्यांनी लेखन केलेले असे आहे.
मात्र
अमीर खुस्रो चे "देवलदी-खिज्रखॉं", "नुह-सिपेहर"," तुगलकनामा " या
तवारिखा, झियाउद्दीन बरनी चे तारीख-ए-फिर्रोजशाही, इब्न बतुता व फेरिश्ता
यांची अरबी-पर्शियन भाषेतील प्रवासवर्णने यातून जे लिहून ठेवले आहे त्यातून
योग्य तो अर्थ काढत मूळ संदर्भ देत हा इतिहास मांडायचा हा एक प्रयत्न !(



Elliot & Dowson : History of India VIII volumes)



Kaustubh Gurav - 6 de julho de 2013 - denunciar abuso
पार्श्वभूमि
खिलजी सुलतान
दिल्लीवर आले त्यावेळेपर्यंत दिल्लीत इस्लामी सत्ता पाय रोवून उभी होती.
दक्षिण भारतात मात्र अद्याप आक्रमणाचा धक्का पोचला नव्हता. सातव्या -आठव्या
शतकात अरबांचे एक मोठे आक्रमण भारतीयांनी यशस्वीपणे परतवले होते. ते एवढे
यशस्वी झाले कि काहि हजारांच्या संख्येने आलेले आक्रमकांपैकी बातमी
सांगण्यापुरतेच काय पाच-दहा जण जिवंअत परतु शकले. याचा जिहादींनी एवढा धसका
घेतला की पुढे १०-१२ पिढयांपर्यंत इस्लामी आक्रमकांनी भारताकडे काणाडोळा
करुन पहाण्याचे धाडस केले नाही. अमेरिकेत दह वर्ष हल्ला झाला नाही तर केवढा
मोठेपणा समजला जात आहे. इथे जागतिक इस्लामीकरण व आक्रमणांच्या सुवर्णकाळात
२००-२५० वर्षे तब्बल ८-१० पिढ्या एकही इस्लामी आक्रमण होऊ शकले नाही हा
हिंदुंचा फार मोठा पराक्रम होता. हा इतिहास सुदधा अधोएखित केला जात
नाही.पुढे सिंध चा काही भाग मुसलमानांनी व्यापला व सक्तीची धर्मांतरे
घडवली. पुन: विजय मिळाल्यावर सिंधु च्या काठावर देवल महर्षींनी त्यांची
प्रख्यात देवलस्मृती रचली व सर्व बाटवल्या गेलेल्या भारतीयांची शुद्धी करुन
टाकली. ( नंतरच्या काळात अगदी शिवकाल व पेशवाईच्या काळातही व आजच्या
काळातही याच देवलस्मृतीच्य आधारावर शुद्धी केली जाते. प्रत्येक स्मृती हि
एक समाजसुधारणा होती.घटनादुरुस्तीच म्हणा ना. स्मृतींना कमी लेखण्याचे कारण
नाही. संपूर्ण देवलस्मृती भाषांतरासह येथे पहा-> http://www.orkut.com/CommMsgs?cmm=26107071&tid=5521474067325686353)



परंतु
पुढे हे धोरण राहिले नाही व ब्राह्मणवर्गाचा शुद्धीविरुद्ध कल होऊ
लागला(दक्षिणा मिळत असली तरी विरुद्ध होता,पावित्याच्या अंध कल्पनांमुळे).
ब्राह्मणेतर समाज शुद्धीच्या बाजूने होता. जसजसा हिंदूंचा सामरिक पराभव
होऊन सत्ता आक्रमकांच्या हाती गेली तसतशी शुद्धी मागे पडली इतकेच नव्हे तर
बाटवलेल्यांवर लक्ष ठेवण्याचीही इस्लामच्या पाईकांना गरज भासेनाशी झाली
कारण बाटलेल्यांना समाज बहिष्कृत करुन स्वत:चेच कट्टर शत्रू निर्माण करत
होता. तरिही कुराणाच्या आज्ञेप्रमाणे काफिरांशी वर्तणुक करणे व्यावहारिक
दृष्ट्या दिल्लीच्या सत्ताधार्यांना  शक्य नव्हते. यावर दिल्ली दरबारात एक
मोठी चर्चा घडली व सर्वानुमते इस्लामचे भारतात काय धोरण असावे यासंबंधी एक
व्यापक धोरण (Policy) ठरवले गेली. मुस्लीम अलिगढ विद्यापीठाने काही
तवारिखांचे हिंदी अनुवादही केले आहेत त्यातील तारीख-ए-फिरोजशाही मधला
संबंधित उतारा जसाच्या तसा,



Kaustubh Gurav - 6 de julho de 2013 - denunciar abuso


"निजामुद्दीन जैनुदी (वझीर) ने उन उलेमाओंसे हो उपस्थित
थे सुलतान के सम्मुख कहा, कि’ इसमें कोई संदेह नही या शक नही की आलिमोंने
जो कुछ कहा वह ठिक है ।हिंदुओंके विषय में यही होना चाहिये कि या तो उनका
वध किया जाए या उन्हे इस्लाम स्वीकार करने पर विवश किया जाए । (किंतु)
हिंदू बहुत बडी संख्या में है। मुसलमान उनके मध्य में दाल में नमक के समान
है। कही ऐसा न हो कि हम उपर्युक्त आदेशोंका प्रारम्भ करे और वे सुसंगठीत हो
कर चारो ओर से विद्रोह तथा उपद्रव आरंभ कर दे। (इसलिए) जब कुछ वर्ष व्यतित
हो जाएंगे और राजधानी के भिन्न भिन्न प्रदेश और कस्बे मुसलमानोंसे भर
जायेंगे तथा बहुत बडी सेना एकत्र हो जाएगी . उस समय्हम आज्ञा दे सकेंगे की
या तो हिंदुओं का कत्ल किया जाए या उन्हे इस्लाम स्वीकार करने पर विवश किया
जाए।


खिलजी कालातही हिंदूंची स्थिती दारुण झाली
होती. हिंदूंकडे द्रव्य साठू नये याची काळजी अल्लाउद्दीन खिलजी चे अधिकारी
घेत. द्रव्य साठले तर हिंदू बंड करतील, त्यांना धर्माच्या आज्ञांप्रमाणे
कठोरपणेच वागवले जावे असेच सवच मुस्लीम सत्ताधार्यांचे मत असे.
अल्लाउद्दीनाच्या काळातील भारतीय प्रजेविषयी रियासतकार सरदेसाई लिहितात,


"हिंदूंना
हत्यारे,घोडे मिळू नयेत किंवा त्यांनी ते बाळगू नयेत,उंची पोषाख करु
नये,छानछोकीने राहू नये असा त्याने बंदोबस्त केला. हिंदुंना जमिनीचे अर्धे
उत्पन्न कर म्हणून भरावे लागे.गाईम्हशींचासुद्धा कर द्यावा लागे.कोणाही
हिंडूच्या घरात सोने,चांदी वा सुपारीसुधा उरली नाही.हिंदू अंमलदारांच्या
बायकांना मुसलमनांच्या घरी चाकरी करावी लागे.हिंदूंना सरकारी नोकर्या
मिळेनाशा झाल्या. मात्र एखाद्याला दरबारात नोकरी मिळालीच तर त्याला लोक
आपली मुलगी लग्नासाठी देत नसत कारण अशा मुलींणा मुसलमानांच्या जनानखान्यात
नोकरीस रहावे लागे" मुसलमानी रियासत पृ. १४१



Kaustubh Gurav - 6 de julho de 2013 - denunciar abuso


तरिही सर्व थरातले हिंदू धर्मनिष्ठच राहिले. प्रसंगी अत्याचार
सोसून व संधी मिळताच उलटुन ते अन्यायाचा प्रतिकार करत.फिरोजशहा तुगलकच्या
काळातली खुद्द दिल्लीतीलच एका धर्मनिष्ठ ब्राह्मणाची एक गोष्ट झियाउद्दीन
बरनी ने नमूद केली आहे ती अशी,
Third Mukaddama.—Burning of a Brahman before the Royal  Palace.
A report was brought to the Sultán that there was in Dehlí an old Brahman (zunár dár), who persisted in publicly performing the worship of idols in his house; and that the people of the city, both Musulmáns and Hindus, used to resort to his house to worship the idol. This Brahman had constructed a wooden tablet (muhrak),
which was covered within and without with paintings of demons and other
objects. On days appointed, the infidels went to his house and
worshiped the idol, without the fact becoming known to the public
officers. The Sultán was informed that this Brahman had perverted Muhammadan women, and had led them to become infidels.
An order was accordingly given that the Brahman, with his tablet,
should be brought into the presence of the Sultán at Fírozábád. The
judges and doctors and elders and lawyers were summoned, and the case of
the Brahman was submitted for their opinion. Their reply was that the
provisions of the Law were clear: the Brahman must either become a
Musulmán or be burned. The true faith was declared to the Brahman, and
the right course pointed out, but he refused to accept it. Orders were
given for raising a pile of faggots before the door of the darbár. The Brahman was tied hand and foot and cast into it; the tablet was thrown on the top and the pile was lighted.
The writer of this book was present at the darbár and witnessed the execution. The
tablet of the Brahman was lighted in two places, at his head and at his
feet; the wood was dry, and the fire first reached his feet, and drew
from him a cry, but the flames quickly enveloped his head and consumed
him. Behold the Sultán's strict adherence to law and rectitude, how he
would not deviate in the least from its decrees.








Kaustubh Gurav - 6 de julho de 2013 - denunciar abuso
आक्रमक ब्राह्मण वर्गाला काही वेळा जिझिया करात सवलत देत असत,
काही वेळा नाकारत असत. फिरिजशह तघलक ने ब्राह्मण वर्गाला सुद्धा जिझिया
देणे भाग पाडले. त्यांच्या उपोषण ,सत्याग्र्ह याकडे दुर्लक्ष केले. शेवटी
थोडीशी सवलत देऊन जिझिया लवला गेला.
The Jizya, or
poll tax, had never been levied from Brahmans; they had been held
excused, in former reigns. But the Sultán convened a meeting of the
learned men and elders, and suggested to them that an error had been
committed in holding Brahmans exempt from the tax, and that the revenue
officers had been remiss in their duty. The Brahmans were the very keys of the chamber of idolatry, and the infidels were dependent on them. They ought therefore to be taxed first.
तवारिखांचा
आदर्श महमूद गझनी असे. तारिखे फिरोजशाहीत जर सुलतान महमुद परत
हिंदुस्तानवर स्वारी करता तर सर्वप्रथम त्याने इस्लामला रोखणार्या
ब्राह्मणांची प्रथम कत्तल केली असती.भारतात हिंदुंना बाटवण्यात मुख्य अडसर
ब्राह्मणांचा आहे. फखरे मुदब्बीर नावाच्या तवारिखकाराने हिंदूंचा विनाश कसा
करावा हे सांगणाराआदाबुल हर्ब वश्शुजाअत नावाचा ग्रंथ लिहिला.




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हसन-खुश्रुखानाची पार्श्वभूमि
अल्लाउद्दीन
च्या वेगवेगळ्या स्वार्यांमधे पराभूत भारतीयांना गुलाम म्हणून आणले जाई.
या गुलामांकडून सक्तमजुरी करुन घेणे ,त्यांना बाटवणे या सारखी कामे करुन
घेतली जात. स्त्रियांना बटकी ,दासी म्हणून जननखान्यात कामे करावी लागत.
इ.स.१२९९
च्या गुजराथवरील स्वारीत अल्लाउद्दीन खिलजीच्या फौजेने केलेया गुजराथवरील
हल्ल्यात गुजराथचा राजा कर्णदेव पराभूत झाला. खिलजींना अपार लूट मिळाली.
त्याचबरोबर राजा कर्ण ची पत्नी कमलदेवी व कन्या देवलदेवी यांनाही पकड्ण्यात
आले. त्यांच्याबरोबर सहस्त्रावधी हिंदू स्त्रिया व बालके पकडून गुलाम
म्हणून दिल्लीला पाठ्वण्यात आली.शेकडो मंदिरे फोडली गेली किंवा मशिदीत
रुपांतरीत केली गेली. खलजी राजवटीवर विशेष काम केलेले इतिहासतज्ञ
के.एस्.लाल आपल्या History of the Khalajij या ग्रंथात लिहितात, "The
buildings of Allauddin outside the Capita lmentioned may be made of the
mosque at Mathura and the tomb of Shaikh Farid which was probably a
converted Hindu or Jain Temple. There is another Masjid built about the
same time at Broach.It is also a convert Jain temple." page 332
याच
स्वारीत वारंवर भ्रष्ट केले गेलेले सोरटी सोमनाथाचे मंदिर पुन: फोडले
गेले, तेथील मुर्ती दिल्लीला आणवून तख्ताची पायरी म्हणून वापरली जाऊ
लागल्याची माहिती तारिख-ए-फिरोजशाही देते.







याच स्वारीत
भारवाड या गुजरातमधील लढाऊ जमातीतले काही कुमार पकडून नेण्यात आले. त्यातील
सर्वात जो देखणा होता त्याचे नाव "हसन" व त्याच्या भावाचे नाव हिसामुद्दीन
असे ठेवले गेले.दरबारातले काही अधिकारी त्यांच्यावर समलिंगासक्त ख्झाले.
पण हा हसन मनातून संतप्त होता. कमलदेवी हिला अल्लाउद्दीनाने जनानखान्यात
घातले तर तिची मुलगी देवलदेवी हि अल्लाउद्दीनाचा मोठा मुलगा खिज्रखानाकडे
पाठवण्यात आली. हसन वर अल्लाउद्दीनचा धाकटा मुलगा मुबारक खान याची अतोनात
मर्जी झाली. खुश्रुखानाची जात काही वेळा परवार काही वेळा भारवाड अशी
तवारीकातून दिली गेली आहे. या जातीविषयी माहीती अशी:- "काही मातापंथीय
काही रामानंदपंथी- झाला बापजी या पुण्यवानास भजतात-नवस करतात-मृतांस
जाळतात- क्रियाकर्म ब्राह्मणांकडून केली जाते-,वस्ती- गुजराथ व काही
महाराष्ट्र- कृष्णाचा धर्मपिता नंद ज्या जातीचा होता त्याच मेहेर जातीचे
हे लोक अशी एक कथा- काहिंचया मते वैश्य पुरुष व शूद्र स्त्री यांपासून हि
जात निर्माण झाली ( शुद्र म्हणजे सवर्णच सवर्ण शब्दाची फोड ज्याला वर्ण
आहे तो शूद्र हे सुद्धा स-वर्णच)-मुळचे गोकुळ ,वृंदावनातील असावेत. पुरुष
कमरेभोवती,डोक्याला व खांद्यावर अशा तीन घोंगडया
घेतात-गुरांचे,शेळ्यामेंढ्यांचे कळप पाळणे,दूध विकणे हे व्यवसाय- लग्नात
ब्राह्मण पौरोहित्य करतो तो उपलब्ध नसल्यास मुलीकडील एखादी व्यक्ती करते-
सोडचिठठीची पद्धत-विधवेस धाकट्या दिराशी लग्न करता येते. (संदर्भ भारतीय
संस्कृती कोश)








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परिया,परवार किंवा बरवड अशी काही असली तरी एक गोष्ट नक्की की हि
एक लढाऊ जात असून त्या काळात सैन्यात नोकरीला या लोकांना बर्याच राजांकडून
ठेवले जात असे.
विटंबित झालेला "हसन" संधीची वाट पहात होता. आपल्या
पराक्रमाने तो वरच्या पदाला पोचत होता. सन १३१६ बाटलेल्या मलिक काफूर याने
अल्लाउद्दीन ला  ठार मारले व स्वत:च सुलतान झाला. अल्लाउद्दीनाच्या सर्व
मुलांना त्याने कैदेत घातले पण हसन खुष्रुखानाच्या अंतस्थ सहायामुळे लवकरच
मुबारकखानाला सुटका होऊन मलिक काफुरला ठार करता आले.मुबारकखान लगेचच
तख्तावर आरुढ झाला व सुलतान कुतुब-उद-दीन नावाची द्वाही फिरवता झाला. या
हसनला  त्याने खुश्रुखान हि पदवी देऊन सर्व राज्यकारभार त्याच्या तंत्राने
चालवू लागला.खुश्रुखानाने आपल्या गुप्त बेतांचा कोणताही सुगावा लागु दिला
नाही. पण त्याच्या मनात दिल्लीला हिंदुपदपादशाही स्थापन करण्याचे विचार
होते हे त्याच्या पुढच्या कृत्यांवरुन दिसून आले.मलिक काफुरप्रमाणेच
खुश्रुखानानेही दक्षिणेत विजय मिळवले.पण त्याने हिंदू राजांना जिंकले तरी
सुलतान दक्षिणेकडची स्वारी त्याच्या आधीन करुन दिल्लीत परतल्यावर खुश्रुने
हिंदुंवर अत्याचार केल्याचे दिसत नाही.


उलट
मलबार ला ताकीखान
नावाच्या एका धनाढ्य मुसलमान सावकराशी त्याचे वैर उत्पन्न होऊन त्याची सर्व
संपत्ती त्याने हरण केली. दक्षिणेतील हिंदु राजांबरोबर त्याने कटकारस्थाने
सुरु केल्याची कागाळि सुलतान कुतुबुद्दीनाकडे होऊ लागल्याने अचानक त्याला
दिल्लीला परत येण्याचा हुकून दिला गेला. काही तवारिखकार त्याला कैद करुन
आनले गेले असेही लिहितात. यावेळी खुश्रुखानाच्या मनात कदाचित दिल्लीला परत न
जाताच तेथील हिंदु राजांच्या मदतीने स्वतंत्र राज्य स्थापन करायचा विचार
असावा.
(Mullik Khoosrow, who had gone to Malabar, stayed
there about one year. He plundered the country of one hundred and
twenty elephants, a perfect diamond, weighing one hundred and
sixty-eight ruttys, with other jewels, and gold to a great amount. His
ambition was increased by his wealth; and he proposed to establish
himself in the Deccan in an independent sovereignty.)







त्याआधी
त्याच्या भावाला, हिसामुद्दीन याला,गुजराथचा सुभेदार म्हणून पाठवले असता
तेथील हिंदू सरदारांशी कट केल्याच्या सुगावा लागल्याने पकडून दिल्लीला
आणवले गेले असता शिक्षा म्हणून त्याला
४-२ थोबाडीत मारुन सुलतानाने सोडून
दिल्याची तक्रार तवारिखातून दिसते.






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याचप्रमाणे खुश्रुखानाचा दक्षिणेतला कट फसला असावा व त्वरित
दिल्लीला परतावे लागले. दिल्लीला परतल्यावर खुश्रुखानाने आपण जिंकलेली
संपत्तीची रास सुलतानापुढे ओतली. सुलतानाने त्याचा बहुमान करुन
त्याच्याविरुद्ध कागाळ्या केलेया सरदारांना कडक शिक्षा केल्या.
खुश्रुखानाने यापूर्वीच आपल्या बर्याचशा हिंदू नातेवाईकांना दिल्लीला
बोलावून घेतले होते. त्यांना काही अधिकाराच्या व सैन्यातील जागाही
देवविल्या होत्या. त्याच्या मामाचे नाव "रणडोल" असे अमीर खुस्रो लिहितो.
इतर सहकार्यांची नावे कर्कमाजनाग, ब्रह्म,जहारिया अशी काही सामान्य तर
काही चमत्कारीक वाटणारी दिली आहेत.झियाउद्दीनने "तोबा" नावाच्या एकाच
साथिदाराचे नाव दिले आहे. हा दरबारात विदुषकी चाळे करीत असावा असे दिसते.





परंतु
तवारिखांनी दिलेलि माहिती व शिव्याशाप नि:संशय एकतर्फी आहेत. अमीर खुस्रो
हा "निजामुउद्दीन औलिया" याचा चाहता होता. त्याची आई हिंदू असून त्याचे
बालपण आजोळी गेल्याने त्याच्यावर नि:संशय कडवे संस्कार जाले नव्हते.
त्याच्या तुगलकनामात त्याने तुलनेने खुश्रुखानाविषयी झियाउद्दीन बरनी
पेक्षा सौम्य भूमिका घेतली आहे.हे दोघेही या सर्व इतिहासाचे प्रत्यक्षदर्शी
दरबारी असल्याने त्यांनी लिहिलेल्या माहिती ला नक्कीच मोल आहे.
निजामुद्दीन औलिया हा नंतर सत्तेवर आलेल्या तुघलकांच्या विरोधी होता.
"दिल्ली तो बहोत दूर है " हा इतिहासप्रसिद्ध वाक्प्रचार म्हणजे या
अवलियाने घियासुद्दीन तुघलकाचा आदेशाला दिलेले उत्तर आहे. असो.एकंदरीत
खुश्रुखानाने सुलतानाची त्याच्यावरील कामासक्ती, स्वत:चा पराक्रम व अभिनय व
आपल्या भारवाडांचे सैन्य या जोरावर आपला पक्ष बळकट करत आणला होता.






रियासतकार
सरदेसाई खुश्रुखानाविषयी लिहितात - "खुश्रुखानाचे आचरण चमत्कारिक आहे.
त्याच्या हातून अनेक असंबद्ध कृत्ये घडली. प्रथमत: त्याने सरकारी खजिना
खुला करुन फौजेस मुबलक द्रव्य देऊन तिला वश केले. त्याने आपल्या नावाचा
खुत्बा वाचवला,स्वत:ची नाणी पाडली व पुढे स्वत:ला हिंदु समजून तो
मुसलमानांविरुद्ध वर्तन करु लागला.त्याने देवलदेवीशि लग्न केले ( गुजरात
ची अल्लाउद्दीन ने पळवलेली राजकन्या ,राजा करण घेला याची मुलगी). त्याच्या
हिंदु अनुयायांनी दिल्लीतील सर्व मशिदीत मुर्ती स्थापन केल्या.
.....चितोड व रणथंबोरच्या हिंदु राजांन्नी प्रयत्न केला असता तर त्यांना
स्वतंत्र होण्याची संधी होती. पण त्यंनी प्रयत्न केला नाही. ...









हिंदुपदपादशाही स्थापण्याची खुश्रुखानाची फार इच्छा होती. त्याच्याविषयी
बखरकारांनी दिलेली माहिती नि:संशय एकतर्फी आहे. ह्यावेळी हिंदुंनी
लिहिलेली माहिती सापडली तर त्यांच्या या बंडाचा चांगला उलगडा होऊ शकेल.






"
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यानंतर प्रत्यक्ष दिल्लीच ताब्यात घेण्याची योजना खुश्रुखानाने
आखली.इब्न बतुता या प्रवाशाने दिलेल्या माहितीनुसार त्या काळी स्वत:हून
मुसलमान होऊ इच्छीणार्या हिंदूंना स्वत: सुलतान भेटून सोन्याची साखळई
,थोडेफार द्रव्यादी सन्मान देत असे.
One day Khusrú Khán
told the Sultán that several Hindus desired to become Musulmáns. It is
one of the customs in this country that, when a person wishes to become
a convert to Islám, he is brought before the king, who gives him a
fine robe and a necklace and bracelets of gold, proportionate in value
to his rank. The Sultán told Khusrú to bring the Hindus before him, but
the amír replied that they were ashamed to come by day on account of
their relations and co-religionists. So the Sultán told him to bring
them at night.
वरील मजकुरात फार अर्थ भरलेला आहे. एकतर
शांततेच्या काळात पैसा वापरुन आमिष दाखवून धर्मांतरे होत. ज्यांना या
फायद्यांसाठी बाटायचे होते त्यांना त्याची शरम वाटे. म्हणून त्यांना बळाने
रोखु शकणारा कोणीही नसला तरीही ते हे कृत्य करण्यास समाजापासून लपुन छपुन
जात. सर्व जाती व वर्ग सहसा धर्म बदलण्यास अनुकूल नव्हते. बहुतेक
स्वार्यंमधे हजारो लोक बाटवले जात. पण समाज धुरीणांच्या महामुर्ख पणा मुळे
या बाटलेल्या लोकांची शुद्धी होण्याची शक्यताच उरली नव्हती व आक्रमक
राष्ट्राला एकदा बाटवलेल्यांवर नजर ठेवण्याची गरज उरत नसे. युरोप व अन्य
जगात मात्र अरबी राष्ट्रवाद्यांना नव्यानेच सामिल केलेल्या राष्ट्रिकांना
संभाळणे हि डोकेदुखी असे कारण संधि मिळताच ते लोक इस्लाम सोडत.









रात्री
मुसलमान होऊ अशा बहाण्याने आलेले सर्व हिंदूंनी अचानक दंगल माजवली.
सुलताना संशय येऊन तो पळू लागला. तेवढ्यात खुश्रुखानाचा सहकारी जहारीया
तिथे पोचला व सुलतानाचे डोके त्याने छाटुन टाकले.




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उजाडता उजाडता सर्वत्र खुश्रुखानाच्या नावे द्वाही फिरवली जाऊन
सर्व दरबारींना भारवाडांनी पकडून आणले व सर्वांची नव्या सुलतानाला मान्यता
मिळाली. सुलतान नासिरुद्दीन खुश्रुशहा असे नाव घेऊन तख्तावर बसला.
येथपर्यंत जे झाले ते सत्तांतरच्या इतिहासात सर्वसामान्य होते. अल्लाउद्दीन
खिलजी स्वत:चा चुलता व सासरा जल्लालुद्दीन खिलजी चा खून करुन सत्तेवर आला.
मलिक काफुरने खिस्रखानाचे डोळे फॊडले. तर  मुबारक खान उरल्यासुरल्या अंध
केलेल्या भावांचा खून करुन त्यांच्या बायका आपल्या जनानखान्यात घालून
तख्तानशीन झाले होते. पण सर्वजण खलिफाचे प्रतिनिधी, इस्लामचे नेक पाईक ,
भारत दारुल-इस्लाम करण्याला कटीबद्ध होऊन आले होते. परंतु नव्या सुलतानाने व
नविनच खेळ आरंभला. दिल्लीतील मशिदीतून मुर्तींची स्थापना केली जाऊन
पूजाअर्चा होऊ लागली, कुराणाचा सन्मान राखला गेला नाही, मुसलमान स्त्रिया
हिंदूंच्या आती सोपवल्या गेल्या इ. आरडाओरड व आरोप त्यांनी खुश्रुखानावर
करत त्याच्यावर शिव्यांची लाखोली वहात, त्याची खालची जात काढत तवारीखांनी
केली आहे. खुश्रुखानाने गोहत्याबंदी केली व जे जे हिंदूंना पवित्र त्या
सर्वाचे पावित्र्य राखण्याचे हुकूम काढले गेले.







झियाउद्दीन बरनी लिहितो,"हिंदुओने
कुरान का कुर्सी के स्थान पर प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया ।मस्जिद के
ताकी में मुर्तिया रख दि गयी और वहा मूर्तीपूजा होने लगी। उस xxx का
राज्याभिशेक होने से तथा हिंदुओंके अधिकारसंपन्न होने से काफिरी नियमोंको
उन्नती प्राप्त होने लगी।"
इसामी हा आपल्या फुतुहत सलाटीन मध्ये लिहितो," खुसरोखॉं के शासन में मुसलमान अत्यंत निर्बल हो गये। मुसलमानोंको बडी हानी पहुंची।"
इब्न बतुता लिहितो,"

जब खुसरो खॉं सुलतान हुआ तो उसने हिंदुओंको विशेषरुप से सम्मानित करना
प्रारम्भ कर दिया। वह खुल्लमखुला इस्लाम के विरुद्ध कार्य करने लगा । उसने
काफीर हिंदुओंकी प्रथा के अनुसार गौहत्या रोक दी । हिंदू गौ का बडा सम्मन
करते है । खुसरो खॉं  चाहता था की मुसलमान भी ऐसाही करे।"




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"This event occurred on the 25th of Rubbee-ool-Awul, in the
year 721. In the morning Khoosrow, surrounded by his creatures, ascended
the throne, and assumed the title of Nasir-ood-Deen. He then ordered
all the slaves and servants of Moobarik, whom he thought had the least
spark of honesty, to be put to death, and their wives and children to be
sold as slaves. His brother was dignified with the title of Khan Kha-nan, or chief of the nobles, and married to one of the daughters of the late Alla-ood-Deen.
Khoos-row took Dewul Devy, the widow of his murdered master and
sovereign to himself, and disposed of the other ladies of the seraglio
among his beggarly relations."
-The History of the Rise of Mohammedan Power in India
तथापि
मुसलमानांनाही एकदम दुखावणे बरे नाही म्हणून इमामांकडून त्याने आपल्या
नावाचा खुत्बाह पढवून घेतला. खुत्बा म्हणजे सुलतानाच्या सन्मानाची
प्रार्थना व घोषणा असते. त्याचबरोबर त्याने आपल्या नावाचे नाणेही पाडून
घेतले. सुदैवाने ते आजही उपलब्ध असून ते पुढील प्रमाणे आहे,


Kaustubh Gurav - 6 de julho de 2013 - denunciar abuso
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Nasir al-Din Khusru (1320), Billon 2-gani
Weight: 3.53 gm., Diameter: 17 mm., Die axis: 11 o'clock
Legend: al-sultan al-azam nasir al-dunya wa'l din, dated 720 (= 1320 CE) /
Legend, within circle: shah khusru, around: al-sultan wali amir al-muminin
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यानंतर खुश्रुखानाने देवलदेवीशी विवाह केला. तिचे या कटात मोठा
सहभाग असल्याचे सावरकरांनी नमूद केले असले व बरेच महत्व दिले असले तरी तसा
कोणताही ऐतिहासिक पुरावा फारसा मिळत नाही.मात्र एकंदरीत गुजरातच्या या
राजकन्येच्या आयुष्याची परवड झाली यात संशय नाही.



खुश्रूखानाची
कारकिर्द खुश्रूखानाची सुलतान म्हणून कारकिर्द २० एप्रिल १३२० ते ६
सप्टेंबर १३२० अशी साधारण साडेचार महिन्यांची आहे. (संदर्भ Advance study
in the History of India by J.L.Mehta page nos.185-86)
पहिल्या
तीन महिन्यात त्याच्याविरुद्ध कोणाही मुसलमान सरदाराची ब्र ही काढण्याची
छाती झाली नाही. मात्र यावेळी देशाच्या अन्य भागातील हिंदू राजांनी कोणताही
उठाव केला नाही. बहुतेक स्वस्थ रहा व पहा असे धोरण त्यांनी अवलंबले. खरे
तर यावेळेपर्यंत खिलजी राजवटींविरुद्ध अन्य राजे उठाव करत असत. ते शांत
बसले होते असे अजिबात नसून हिंदूंचा सततचा अंतर्गत उपद्रव व सीमेवर
मोगलांचे हल्ले याने ते त्रासलेले असत. हा उपद्रव एवढा होता की वेड्या
महंमदाने आपली राजधानी देवगिरीला हलवण्याचा प्रयत्न केला. त्यातून हिंदू
बंडखोरांवर लक्ष ठेवणे सोपे जाईल असा त्याचा कयास होता. पण या काळात
कोणताही उठाव झाला नाही व परकिय राष्ट्राविरुद्ध उठाव करण्याची हि एक
चांगली संधी भारतीयांनी गमावली असेच म्हणावे लागते.







गियासुद्दीन
तुघलक हा पंजाबचा सुभेदार असून कुशल असा सेनापती होता. मोगलांशी त्याला
सतत युद्ध करावे लागल्याने लढाई करण्यात अनुभवी होता. त्याने
खुश्रूखानाविरुद्ध प्रथम इस्लाम खतरेमेची घोषणा केली. प्रथम त्याने काही
सरदरांना गुप्तपणे पत्रे पाठवली. पण खुश्रुखानाच्या दहशतीमुळे फारसे कोणी
खुश्रुखानाच्या विरुद्ध जाण्यास धजेना. याचवेळी फक्रुद्दीन जेना हा
तुघलकाचा मुलगा जो पुढे वेडा महंमद म्हणून इतिहास प्रसिद्ध झाला तो एका
रात्री खुश्रूखानाच्या कैदेतून निसटण्यात यशस्वी झाला. खुश्रुखानाने संकट
ओळखून ताबडतोब एक तुकडी आपल्या भावाच्या नेतृत्वाखाली तुघलकावर पाठवून
दिली. यानंतर अजून काही मुसलमान सरदार तुघलकाला जाऊन मिळू लागले. तघलकाचे व
खुश्रुखानाच्या सैन्याची शेवटी "इंद्रप्रस्थ" या प्राचीन नगरात गाठ पडली.



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तुघलकनामामध्ये अमीर खुस्रो ने या लढाईचे वर्णन दिले आहे. तो
लिहितो," खुसरो खॉं के भाई हिसामुद्दीन ,राय रायॉं रंधोल  हातिम खॉं, और
बहुत से नये अमीर जो गुलामी से अमीरी की श्रेणी तक पहुंचे थे अपनी अपनी
सेनायें लिए साअथ थे। सेनाके आगे हाथियों की पंक्तिया थी और उन्ही के चारो ओर दस हजार ब्रादि ( अर्थात भारवाड) जाति के सवारे थे। उनके नाम अहर देव,अमर देव,नर्सिया,पर्सिया, परमार आदि थे।"
युद्ध
सुरु झाले. सुरुवातीला खुश्रुखानाला यश मिळत होते. पुन: एकदा बाजी पलटली
तेव्हा सर्व हिंदू सैंन्य संतापले व ग्यासुद्दीनाच्या सैंन्यावर तुटुन
पडले.
अमीर खुस्रो लिहितो,"...इतने में हिंदुओंकी
सेनाने आक्रमण कर दिया। मैल गाजी (तुगलक) तुरंत इस भय को भॉंप गया ।
हिंदुओंके "नायाsssयण" के नारे के साथ उसने "अल्ला हू अकबर का नारा लगाया ।
किन्तु यह आक्रमण इतनी तीव्र गतीसे किया गया था कि गाजी के सॅंभलते सॅंभलते हिंदुओंने उसकी सेना के बहुत झण्डे काट डाले ।"



याप्रमाणे
हिंदूंचा विजय झाला व ग्यासुद्दीन काही अंतरापर्यंत पळून गेला. पण निकराची
वेळ ओळखून त्याने फिरुन पुन: सैंन्य गोळा केले व विजयाने गाफील झालेल्या
खुश्रुखानाच्या सेनेवर परत आक्रमण केले. तुगलकाचा हा हल्ला अचानक व वेगाने
झाल्याने त्याच्या सैंन्यापासून वेगळा पडला. हिंदुंधे अंदाधुंदी माजली.
काही जण दिल्लीकडे पळाले तर काही जण गुजरात च्या दिशेने. त्यांचा पाठलाग
करुन त्यांना मारण्यात आले. काही पळाले. खुश्रुखानालाही पकडून ताबडतोब ठार
मारले गेले. सक्तीने बाटवलेल्या व अन्य हिंदूचा एक उद्रेक फसला.
खुश्रुखान
अपयशी ठराला.







पण त्याचे महत्व कमी होत नाही. छळात पिचून जाऊनही त्याने
आपल्या हिंदुत्वाची निष्ठा मनात जागरुक ठेवली होती व वेळ येताच ४-५
महिन्यांसाठी का होईना दिल्लीचा हिंदू सुलतान बनला. बाटलेल्यांनी आपल्या
हिंदू नातेवाईक व मित्रांच्या मदतीने पलटुन वार केल्याची हि पहिलीच घटना
होती. सन ६ सप्टेंबर १३२० ला खुश्रुखान मारला गेला. पण बाटलेल्यांनी परत
हिंद् होऊन हिंदुराज्य स्थापन करण्यासंबंधीच्या त्याच्या स्मृती
इतिहासाच्या गती-प्रतिगतीच्या लाटांवर तरंगत राहिली. सन १३२४ मध्ये
काश्मिरच्या शेवटच्या हिंदू राणी कोटाने आपला नवरा मुस्लीम झाल्याने शस्त्र
उपसले तर दक्षिणेत पुढे केवळ सोळाच वर्षांनी म्हणजे सन १३३६
मध्ये हरिहर व बुक्क या दोन बाटवल्या गेलेया तरुणांनी पुन:श्च हिंदूत्व
स्वीकारून विजयानगरचे प्रबळ व वैभवशाली हिंदू साम्राज्य उभारले.
समाप्त









Kaustubh Gurav - 6 de julho de 2013 - denunciar abuso
सौजन्य:चंद्रशेखर साने
Suyash ................. - 6 de julho de 2013 - denunciar abuso
farach sundar... इथे छापल्याबद्दल धन्यवाद
Kaustubh Gurav - 7 de julho de 2013 - denunciar abuso
पुन्हा झपाटलेला:
farach sundar... इथे छापल्याबद्दल धन्यवाद

Sunday, 20 November 2016

पाकिस्तानचे तीन तुकडे हाच पर्याय.



FADANVISHI  BLOG"s ARTICLE.............   BY MR. AMBARISH FADANVIS...ONLY SHARED BY ME....

इंदिराजींनी असामान्य धैर्य दाखवत पाकिस्तानचे दोन तुकडे केले. तरीही पाकिस्तनाची युद्धाची खुमखुमी कमी झाली नाही. आजवर अनेकदा पाकिस्तानने शस्त्रसंधी मोडल्या आहेत. कारगिलच्यावेळीस भारताला अधिक आक्रमक होण्याची संधी होती पण ती गमावली गेली. अलीकडेच जानेवारीत दोन सैनिकांची हत्या करून त्यांचा शिरच्छेद करण्याची अमानुष, रानटी आणि सर्व आंतरराष्ट्रीय संकेत झुगारणारी घटना घडली. देशभरातून निषेधांचं वादळ उठलं… विरूनही गेलं. आता पाच सैनिकांची हत्या भारतीय हद्दीत घुसून करण्यात आली. पुन्हा निषेधांचं आणि पाकिस्तानला धडा शिकवण्याच्या मागण्यांचं वादळ उठलं आहे. या निमित्ताने महत्त्वाचा परंतु दुर्लक्षित राहिलेला प्रश्न म्हणजे भारतीय लष्कर खरोखरच युद्धसज्ज आहे काय?

सीमा ओलांडून पाकिस्तानी सैनिक आत घुसतात आणि ‘बेसावध’ जवानांना ठार मारतात ही घटना भारतीय लष्कराच्या दृष्टीने नक्कीच भूषणास्पद नाही. पाकिस्तानशी भारताने युद्ध घोषित करावं ही मागणी जोर धरत असली तरी तसं होण्याची शक्यता नाही. जागतिकीकरणामुळे बदललेलं आंतरराष्ट्रीय राजकारण आणि अर्थसत्तांचं राजकीय सत्तांवर वाढत चाललेलं नियंत्रण यामुळे निर्णयशक्तिचं स्वातंत्र्य बाधित झालेलं आहे. पाकिस्तानला अमेरिकेचा आणि चीनचा असलेला छुपा तर कधी उघड पाठिंबाही इथे विचारात घ्यावा लागतो आणि त्याहून महत्त्वाचं म्हणजे जागतिकीकरणाची ‘मधुर’ फळं खायला सोकावलेला नवमध्यमवर्ग युद्धखोरीची भाषा कितीही करत असला तरी युद्धामुळे निर्माण होणार्या संभाव्य आर्थिक पडझडीला सामोरं जाण्याची त्यांची मानसिकता नाही.

सोशल मीडियातून राष्ट्रप्रेमाचं भरतं आल्याचं दाखवण्यात ते धन्यता मानतात. याचा अर्थ असा नव्हे की पाकिस्तानला धडा शिकवू नये. तो शिकवलाच पाहिजे. युद्धाचा उपाय टाळून तो कसा शिकवता येईल यावर आपल्याला गंभीरपणे विचार करावा लागणार आहे. पाकिस्तानचे पूर्वी भारतानेच दोन तुकडे करून दाखवले आहेत. आता त्याचेच तीन तुकडे कसे करता येतील यासाठी कुट नीतिचाच आश्रय घ्यावा लागणार आहे आणि तशी संधी पाकिस्ताननेच निर्माण करून ठेवली आहे.

बलुचिस्तानः

पाकिस्तानचे जे प्रमुख राजकीय विभाग पडतात त्यात बलुचिस्तान हा मोठा भाग आहे. येथील मुस्लीम हे बलुची वंशाचे असून त्यांचं सांस्कृतिक-सामाजिक जीवन हे प्राचीन काळापासून स्वतंत्र राहिलेलं आहे. १९४७ साली पाकिस्तान स्वतंत्र झाला तेव्हापासूनच बलुच्यांनी आपलं स्वतंत्र राष्ट्र असावं यासाठी चळवळ सुरू केली होती. पाकिस्तानमध्ये सामील व्हायला बलुच्यांचा पहिल्यापासूनच विरोध होता. परंतु कलात संस्थानाने १९५५मध्ये पाकिस्तानमध्ये सामील होण्याचा निर्णय घेतल्याने १९६० पासूनच स्वतंत्र बलुचिस्तानची मागणी जोर पकडू लागली. त्यामुळे संपूर्ण बलुचिस्तानात अराजक माजलं. शेवटी पाकिस्तानला १९७३ साली इराणच्या मदतीने लष्करी कारवाई करून विद्रोह दडपावा लागला होता. यात हजारो विभाजनवादी क्रांतिकारी ठार झाले. हे स्वतंत्रता आंदोलन चिरडण्यात पाकिस्तानला तात्पुरतं यश मिळालं असलं तरी १९९० नंतर ही चळवळ पुन्हा उभी राहिली. बलुचिस्तान लिबरेशन आर्मी आणि लष्कर-ए-बलुचिस्तान या संघटनांनी पाकिस्तानमध्ये आजवर अनेक हिंसक कारवाया घडवून आणल्या आहेत. अर्थातच पाकिस्तानने त्यांना दहशतवादी संघटना म्हणून घोषित केलं आहे. बलुचिस्तान हा नैसर्गिक साधनसामग्रीने श्रीमंत प्रदेश असला तरी दारिद्र्याचं प्रमाण याच भागात खूप मोठं आहे. पाकिस्तानने या भागाचा विकास घडवून आणण्यात विशेष पुढाकार घेतल्याचं चित्र नाही. त्यामुळे आणि बलुच्यांच्या रक्तातच असलेल्या स्वतंत्रपणाच्या जाणिवांमुळे स्वतंत्र बलुचिस्तानची चळवळ थांबणं शक्य नाही. दुसरं महत्त्वाचं असं की बलुचिस्तानचा पश्चिम प्रभाग इराणमध्ये सध्या मोडतो. स्वतंत्र बलुचिस्तान होणं इराण्यांनाही अडचणीचं वाटत असल्याने याबाबतीत इराण आणि पाकिस्तान हातात हात घालून आहेत. ही युती तोडता येणं भारताला प्रत्यक्षात कितपत शक्य आहे हा प्रश्न असला तरी भारत पाकिस्तानी बलुचिस्तानला विभक्त करण्यासाठी कसा वेग देऊ शकतो हे पहायला हवं.लष्कर-ए-बलुचिस्तान आणि बलुचिस्तान लिबरेशन आर्मी या दोन्ही गटांत सामंजस्य घडवून आणत भारत त्यांना आर्थिक आणि सामरिक मदत मोठ्या प्रमाणावर पुरवू शकतो. अर्थात तसं करण्यासाठी भारताला अफगाणिस्तानची मदत घ्यावी लागेल. ती कशी शक्य आहे हे आपण पुढे पाहुयात.

पख्तुनीस्तानः


पाकिस्तानचा एक दुसरा मोठा प्रदेश म्हणजे पख्तुनीस्तान (पश्तुनीस्तान) होय. हाही प्रदेश सध्या पाकिस्तानची डोकेदुखी बनलेला आहे. याचं कारण म्हणजे बलुच्यांप्रमाणेच पख्तून (पुश्तू) लोकांचीही स्वतंत्र संस्कृती आणि अस्मिता आहे. पख्तून ही पुरातन जमात असून तिचा उल्लेख सनपूर्व आठव्या शतकातील ऋग्वेदातही येतो. दाशराज्ञ युद्धात भाग घेतलेल्या एका टोळीचं नाव पख्त असं आहे. तेच हे पख्तून लोक होत. सरहद्द गांधी म्हणून गौरवले गेलेले खान अब्दुल गफार खान हे पख्तूनच होते. पाकिस्तान स्वतंत्र होण्याआधीपासूनच पख्तून लोकांची स्वतंत्र राष्ट्र म्हणून जगण्याची अथवा अफगाणिस्तानात सामील होण्याची मागणी होती. याचं कारण म्हणजे अर्धाअधिक पख्तुनीस्तान अफगाणिस्तानात आहे. संस्कृती आणि भाषा हा सर्वांचा समान दुवा असल्याने सर्व पख्तुनांचं एक राष्ट्र असावं अथवा अफगाणिस्तानात विलीन व्हावं ही मागणी तशी न्याय्यही आहे. ब्रिटिशांनी आपल्या फोडा आणि राज्य करा या प्रवृत्तीस अनुसरून १८९३ साली पख्तुनीस्तानची विभागणी केली होती.ज्या रेषेमुळे ही विभाजणी झाली तिला ‘ड्युरांड रेषा’ म्हणतात. ही रेषा पख्तुनांना स्वाभाविकपणेच मान्य नाही. खरं तर १९६५ आणि १९७१च्या भारत-पाक युद्धकाळात पख्तुनीस्तानला स्वतंत्र होण्याची संधी होती. पण केवळ पाकला युद्धकाळात अडचणीत न आणण्याचा निर्णय काही पख्तून राष्ट्रवाद्यांनी घेतला. तो निर्णय चुकीचा होता हे आता पख्तुनांना समजलं असलं तरी राजकीय पटलावर बर्याच हालचाली झाल्या असल्याने पख्तुनांचा विद्रोह आज तरी सीमित आहे. दुसरी महत्त्वाची बाब अशी की आज अफगाणिस्तानातील जवळपास ४५ टक्के लोकसंख्या ही पख्तुनांची आहे. पाकिस्तानातील पख्तुनीस्तान अफगाणिस्तानमध्ये यावा यासाठी अफगाणी सरकारने पूर्वी बरेच प्रयत्न केले असले तरी खुद्द अफगाणिस्तान तालिबान्यांमुळे यादवीत सापडल्याने पुढे पाक-अफगाण राजकीय चर्चेच्या पटलावर हा विषय मागे पडला. बलुच्यांची जशी स्वतंत्र संस्कृती आणि भाषा आहे त्याप्रमाणेच पख्तुनांचीही असल्याने पाकिस्तानचा प्रभाग म्हणून राहण्यात त्यांना विशेष स्वारस्य नाही. त्यात शिया-सुन्नी हा विवाद आहेच. पाकिस्तानातील बव्हंशी दहशतवादी घटनांमागे पख्तून आणि बलुची राष्ट्रवादीच असतात हेही इथे लक्षात घ्यायला हवं. या असंतोषाला भारतच (RAW मार्फत) खतपाणी घालतो हा पाकिस्तानचा जुना आरोप आहे. त्यात मुळीच तथ्य नसेल असं म्हणता येत नाही. किंबहुना ते संयुक्तिकच आहे. परंतु या प्रयत्नांना अधिक व्यापक आणि धाडसी स्वरूप देणं ही काळाची गरज आहे. भारत-अफगाण संबंध हे चांगले राहिले आहेत. याचं कारण म्हणजे तालिबानी राजवट उद्ध्वस्त करण्यासाठी अफगाणिस्तानला मदत तर केलीच परंतु त्या राष्ट्राच्या नवउभारणी प्रक्रियेत सर्वात मोठं योगदानही दिलं. २०११ मध्ये भारताने अफगाणिस्तानशी भागीदारी करारही केला. रशियाच्या आक्रमणानंतर झालेला हा अफगाणिस्तानचा पहिला करार होता. ‘



भारत आमचं बंधुसमान असलेलं राष्ट्र आहे’ अशी प्रतिक्रिया अफगाणी विदेश मंत्रालयाने दिली होती. हे सारं खरं असलं तरी भारताचं विदेश धोरण अनेकदा धरसोडीचं राहिलेलं आहे. त्यामुळे मित्र राष्ट्रांचा हवा तेवढा फायदा करून घेण्यात भारताला अनेकदा अपयश आलेलं आहे. खरं तर पाकव्याप्त पख्तुनीस्तान अफगाणिस्तानात विलीन करवणं अथवा स्वतंत्र राष्ट्र म्हणून त्याची निर्मिती करणं हे अफगाणिस्तानलाही फायद्याचं आहे. स्वतंत्र राष्ट्र बनल्यास अफगाणिस्तान आणि पाकिस्तानमध्ये एक बफर राष्ट्र निर्माण होईल. आज अफगाणिस्तानात होणारे अमेरिकन ड्रोन हल्ले पाकिस्तानी भूमीतून केले जात असल्याने अमेरिकेबद्दल आणि अर्थातच पाकिस्तानबद्दल रोष आहे हेही एक वास्तव लक्षात घ्यायला हवं. अशा परिस्थितीत भारताने स्वतंत्र बलुचिस्तान आणि पख्तुनीस्तानला मोठ्या प्रमाणावर मदत करण्याची आवश्यकता आहे. सिंध आणि पंजाब प्रांत हा सांस्कृतिकदृष्ट्या वेगळा असल्याने तेवढाच पाकिस्तान राहील. ही मदत अफगाणिस्तानातूनच पुरवता येईल अशा पद्धतीने व्यूहरचना करता येणं शक्य आहे. अफगाणिस्तानला त्यासाठी भारताला अधिकची मदत पुरवता यायला हवी. मैत्रीचे संबंध सर्व स्तरांवर अधिक दृढ कसे होतील यावरही लक्ष केंद्रित करता यायला हवं. यासाठी भारतीय नागरिकांनीही सक्रिय पुढाकार घ्यायला हवा. किमान सांस्कृतिक आणि पर्यटनाच्या पातळीवर लोकांना हे करता येणं अशक्य नाही.



नचिकेत सुरेश गुरव - 19 de agosto de 2013 - denunciar abuso
पाकिस्तानी-चीनी ही एक अभद्र युती आहे. व्याप्त काश्मिरमधून पाकिस्तानने चीनला जोडणारा लष्करी महामार्ग बनवून दिला आहे. याबाबत भारताने कधीही तीव्र आक्षेप घेतला नाही अथवा तो रस्ता उद्ध्वस्त करण्याचा प्रयत्न केलेला नाही. भारत-पाक युद्ध झालं तर चीनची मदत अत्यंत वेगाने पाकिस्तानला मिळू शकते. अलीकडेच नवाज शरीफांच्या चीन भेटीत या महामार्गाचं माल वाहतुकीसाठी व्यापारी मार्गातही रूपांतर करण्याचं घाटत आहे. शरीफ यांच्या दृष्टीने पाक अर्थव्यवस्थेला या महामार्गाचं बळ मिळणार असलं तरी ती भारताच्या दृष्टीने मोठी कटकट ठरणार आहे. त्यासाठी भारताची रणनीती काय हे अद्याप स्पष्ट झालेलं नाही. आपले संरक्षण मंत्री ए. के. अँटनी यांनी याबाबत बोटचेपं धोरण स्वीकारलं असल्याने ते निःसंशय टीकेस पात्र आहेत. चीनच्या सीमावादातील मुजोरीला भारत झुकला आहे असंच वरकरणी दिसतं. अशा परिस्थितीत चीनलाही शह द्यायचा असेल तर पाकिस्तानचं त्रिभाजन हाच पर्याय भारतासमोर असला पाहिजे. त्यासाठी भारताने प्रत्यक्ष युद्ध करण्याची गरज नाही. पख्तून आणि बलुच्यांमधील स्वतंत्रतेच्या जाज्वल्य भावनांना प्रोत्साहन देत त्यांना छुपी ताकद सर्वशक्तिनिशी पुरवली पाहिजे. अफगाणिस्तानबरोबरील संबंधांचा त्यासाठी उपयोग केला पाहिजे. तरच आपण खर्या अर्थाने पाकिस्तानचा धोका संपवू शकतो आणि चीनवरही अप्रत्यक्ष मात करू शकतो. पण गरज आहे ती इंदिराजींसारख्या दृढ निर्णय घेऊ शकणार्या पंतप्रधानांची आणि खर्याखुर्या राष्ट्रभावनांनी प्रेरित भारतीयांच्या सामूहिक इच्छाशक्तिची… आणि स्वतःच्या सहभागाचीही.



नचिकेत सुरेश गुरव - 19 de agosto de 2013 - denunciar abuso
Bhartiya guptachar yantrana kadun ase prayatna chalu ahet ase aikun ahe. Jar kharach ase zale tar pakistani anvastre konakade jatil vaa jane aaplya hitache ahe ??
Yatil aaplyala faydyacha vaa kami upadravi kon asel ??
DJ Rajesh music lover - 19 de agosto de 2013 - denunciar abuso




भारत  या देशाकडून फार मोठ्या अपेक्षा ठेवू नका. कोन्ग्रेस च्या काळात तरी. भारतच्या ताब्यातील  छोटासा काश्मीर विभाग नीटपणे ताब्यात ठेवता आला नाही, तर पाकिस्तानच्या ताब्यातील बालुचीस्तानला कसली मदत करणार ?
आधी काश्मीर मध्ये हिंदुना सुरक्षित वातावरण तयार करा, जिहादी घटकांना नष्ट करा, मग पाकिस्तानचे काय ते बघत येईल.
किवा काश्मीर वरील नियंत्रण हि तुमची घटक चाचणी समजा. वार्षिक परीक्षेला अजून खूप वेळ आणि अभ्यास आहे.



Mangesh J - 19 de agosto de 2013 - denunciar abuso
आपन  प्रयत्न करो या न करो ..पाकिस्तान त्याच्या  कर्माने याचे तुकडे होतील .....अणि मग अखंड भारताची सुरुवात ..
yashdeep joshi - 19 de agosto de 2013 - denunciar abuso
सोनवणी सरांचा लेख आवडला . हा लेख जास्तीत जास्त ठिकाणी शेयर करा .
सलमान खुर्शीद, अहमद पटेल  इत्यादी लोकांकडून काहीही होणार नाही .
आपण अजून विचारच करत असलो, तरी पाकिस्तान "काश्मीर - केरळ - आसाम" इत्यादी भागांतील मुस्लिमांच्या भावना भडकावून भारताचे तुकडे पडण्यासाठी केव्हाचाच कार्यरत आहे .



१] सर्वांत पहिले म्हणजे - "नवाज शरीफला कारगिल युद्धाची कल्पनाच नव्हती" हा
मीडियाकडून पसरवण्यात आलेला गैरसमज तुम्ही डोक्यातून  काढून टाका.
नवाज शरीफ हा अत्यंत बदमाश- चालू माणूस आहे. स्वतः नामानिराळे राहून भारतविरोधी षड्यंत्र चालू ठेवायची हा त्याचा डावपेच आहे . भारतातील अनेक पत्रकारांना हि वस्तुस्थिती माहित आहे.
दुर्दैवाने सलमान खुर्शीद वगैरे मंडळी जेव्हा पाक-मैत्री इत्यादी गोष्टी करतात, तेव्हा कीव तर येतेच पण किळस वाटते .



२] दुसरा मुद्दा म्हणजे - पाकिस्तानचे राजनैतिक वर्तन पाहिले तर मला तरी त्यांच्यात "राष्ट्रीय अस्मिता" दिसलेली नाही . हिंदूंपासून वेगळे होऊन, प्रांत वेगळा करून , समस्त जगाला इस्लामी भूमी बनविण्याच्या जीहाद करण्यात योगदान देण्यासाठीच पाकिस्तानची निर्मिती झाली आहे.
माझ्या पुढील व्हिडियोमध्ये तुम्हाला त्याचा पुरावा सापडेल .
हे येथे सांगण्याचा उद्देश आगामी भागांत चर्चा करू .






yashdeep joshi - 19 de agosto de 2013 - denunciar abuso
http://www.youtube.com/watch?v=gmPKUrLbgjg
yashdeep joshi - 19 de agosto de 2013 - denunciar abuso
http://www.youtube.com/watch?v=UtWf4lTUt_I
yashdeep joshi - 19 de agosto de 2013 - denunciar abuso
आधी काश्मीर मध्ये हिंदुना सुरक्षित वातावरण तयार करा, जिहादी घटकांना नष्ट करा, मग पाकिस्तानचे काय ते बघत येईल.
किवा काश्मीर वरील नियंत्रण हि तुमची घटक चाचणी समजा. वार्षिक परीक्षेला अजून खूप वेळ आणि अभ्यास आहे.



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माननीय राष्ट्रपती प्रणव मुखर्जी यांनी अफजल गुरु आणि कसाब यांच्या दयेचा अर्ज झटपट फेटाळून अत्यंत अभिनंदनीय कृती केली . प्रतिभा पाटील यांना ५ वर्षांत हि सद्बुद्धि कशी काय झाली नाही, याचेच आश्चर्य वाटले .
लक्षात घ्या  - अजमल कसाब जगला काय मेला काय, पाकिस्तानला त्याची काहीही पर्वा नव्हती .
प्रणवदा आले, तेव्हा कुठे, देशाला अस्तित्वमान पंतप्रधान नसला, तरी किमान एक राष्ट्रपती तरी आहे, याची अनुभूती आली.
अजमल कसाब हा जगला काय किंवा मेला काय, पाकिस्तानला काहीही पर्वा नव्हती . कारण पाकच्या धर्मांध मुस्लिम लोकांसाठी जिहादी मार्गाने हिंदू निष्पाप लोकांच्या कत्तली करणारासुद्धा "जन्नतला' जात असतो, त्यामुळे कासाबला "जन्नतचे " सद्भाग्य मिळेल हि त्यांची समजूत.


दुसरीकडे पाकिस्तानात मध्यमवर्गच अस्तित्वात नसल्याने  व दारिद्र्यात जगणारी जनता भरपूर असल्याने त्यांना कसाब्चे वर्तमानविषयी काहीही माहिती नव्हती, तसेच त्यांना त्याविषयी जिज्ञासाही नव्हती .
तिसरे म्हणजे आय.एस. आय ने २६ - ११ चा हल्ला हा भारताचाच डाव आहे, असे सांगितल्याने कसाब हा आय.एस. आय वर विश्वास ठेवणा-यांसाठी कसाब केवळ बळीचा बकरा होता .
चौथे म्हणजे जे ०.१ % मानवतावादी लोक पाकिस्तानात असतील , ते स्वतःच मान्य करतात कि पाकिस्तान हा स्वतः निर्माण केलेल्या दहशतवादात गुरफटत चालला आहे,  त्यामुळे कसाब्च्या जीवनाचा अंत काय होणार याची त्यांना कल्पना होतीच .
हे येथे सांगण्याचे प्रयोजन म्हणजे - जर  अफजल गुरूला - कसाबला फासावर चढविण्यास आपण नको तेवढी दिरंगाई करत असू , तर आपण स्वतः सैनिकांचे मनोबल खच्ची करत आहोत . कसाब आणि अफझल गुरु यांच्या फाशीचा विषय कोणी मुस्लिम व्होट-ब्यान्कशी जोडत असेल, तो तर देशद्रोही मानायला हवा.
दुर्दैवाने विक्रमी विदेशदौरे करणारे आधीचे राष्ट्रपती, त्याविषयी फार जागरूक दिसले नाहीत .





Kaustubh Gurav - 19 de agosto de 2013 - denunciar abuso
Nachiket
100% agreed
Shailendrasingh Patil - 19 de agosto de 2013 - denunciar abuso
नेहेमीप्रमाणे भारत बेसावध आहे. कदाचित सरकारने आता सैन्याला तयारीचे आदेश दिले असावेत. ती तयारी ह्या हिवाळ्यापर्यंत तरी संपणार नाही. तोपर्यंत जनमत बनवायचं आणि हिवाळा संपताच पाकिस्तानवर हल्ला करायचा असा प्लान असावा. ते युद्ध जिंकुन निवडणुकीला सामोरे जाणे कॉंग्रेसच्या सोयीचे होईल. भारताला युद्ध जिंकता येतात, नंतरच्या चर्चांमधे मात्र आपण सगळं गमावुन बसतो.
पाकिस्तानची शकले करायची असतील तर पाकिस्तानातील फ़ुटिरतावाद्यांना खुप पैसा पोहोचवता यायला हवा. जागतिक मिडियातुन तसा प्रचार करायला हवा. तो प्रचार शिगेला पोहोचला कि मग लष्करी कारवाई करुन तुकडे पाडता येतील.



Suyash ................. - 19 de agosto de 2013 - denunciar abuso
आपल्या सैनिकांवर हल्ला झाल्यावर २ दिवसात क्वेटा  मध्ये स्फोट झालेत, जे अफगाण सीमेवर आहे
अविनाश बेधुंद.स्वच्छंदी..मुक्त जीवन - 19 de agosto de 2013 - denunciar abuso
भारताचे तुकडे होत आहेत त्याचा विचार म्हत्वाचा.
अविनाश बेधुंद.स्वच्छंदी..मुक्त जीवन - 20 de agosto de 2013 - denunciar abuso
Shailendrasingh Patil:


नेहेमीप्रमाणे भारत बेसावध आहे. कदाचित सरकारने आता सैन्याला तयारीचे आदेश दिले असावेत. ती तयारी ह्या हिवाळ्यापर्यंत तरी संपणार नाही. तोपर्यंत जनमत बनवायचं आणि हिवाळा संपताच पाकिस्तानवर हल्ला करायचा असा प्लान असावा. ते युद्ध जिंकुन निवडणुकीला सामोरे जाणे कॉंग्रेसच्या सोयीचे होईल. भारताला युद्ध जिंकता येतात, नंतरच्या चर्चांमधे मात्र आपण सगळं गमावुन बसतो.
पाकिस्तानची शकले करायची असतील तर पाकिस्तानातील फ़ुटिरतावाद्यांना खुप पैसा पोहोचवता यायला हवा. जागतिक मिडियातुन तसा प्रचार करायला हवा. तो प्रचार शिगेला पोहोचला कि मग लष्करी कारवाई करुन तुकडे पाडता येतील.
मुद्द्यात दम आहे...मोदी ला डिफ्युज करणा साठीचा उत्तम मार्ग..अर्थात लोक किति फसतिल व आर्थिक द्रुष्ट्या परवडणार का?



Ambareesh Phadnavis - 20 de agosto de 2013 - denunciar abuso

आगामी काळ कठीण आहे. २०२४ पर्यंत तरी कठीण आहे. २०१४-२०२४ हा बिकट काळ आहे. पाकिस्तानचे तीन तुकडे करणे वगैरे ठीक आहे, प्रॉब्लेम कसे करायचे हा आहे.
शैलेंद्रजी योग्य म्हणाले पण त्यात आणखीन एक पदर आहे जो त्यांनी सोडला आहे. पाकिस्तान च्या अस्तित्वाची सर्वात मोठी ग्यारंटी खुद्द दिल्ली स्थित भारतीय सत्तेने घेतली आहे. दिल्ली ची लॉबी (निव्वळ कॉंग्रेस नाही, तर भाजप चे देखील युपी आणि दिल्लीमधले काही नेते) पाकी लोकांशी पप्पी-झप्पी करत असते. जोवर हि लॉबी सत्तेत आहे, तोवर पाकिस्तान ला समूळ धक्का लावण्यात येणार नाही.
पाकिस्तान शी युद्ध म्हणजे चीन-अमेरिका-ब्रिटन या तीन देशांशी एकत्रित युद्ध आहे. भारताची ती तयारी नाही.
दिल्ली च्या या लॉबीला सत्तेत ठेवायला पाकिस्तान देखील एक लहान विजय भारताला देऊ शकतो. तुंडा चे हस्तांतरण देखील यातलाच एक भाग आहे.
निर्णायक लढाई किंवा संघर्ष दहा वर्षांनी होईल.. तोवर काश्मीर आणि (किंवा) पूर्वोत्तर भारत हातचा गेलेला असेल आणि भारतात मोठ्या प्रमाणात रक्तपात, दंगली आणि गृहयुद्ध सदृश परिस्थिती उद्भवलेली असेल. जर भारतीयांनी (बहुतांश हिंदूंनी) तेव्हा जागे होऊन प्रत्याक्रमण सुरु केले (प्रत्येक पातळीवर, समजेल त्याच शब्दात आणि कृतीत) तर भारत परत गेलेला भाग परत मिळवू शकतो. प्रत्याक्रमण सामाजिक पातळीवर, गुंडांच्या पातळीवर, सामरिक पातळीवर, वैचारिक पातळीवर सर्वात मुख्य म्हणजे धार्मिक आणि सांप्रदायिक पातळीवर होणे आवश्यक आहे. आणि ते होईल.



पण हे सगळे भीषण रक्तपातानंतर सुचलेली अक्कल असेल. पाकिस्तान चा बंदोबस्त करणे म्हणजे इस्लाम चे भारतीयीकरण आणि हिंदुकरण करणे.  हे महाराष्ट्रात सर्वांना आता पटणार नाही. पण किश्तवाड, कोक्राझार, बंगाल, केरळ, मेरठ, उत्तर-बिहार वगैरे ठिकाणी हिंदू लोकांना हे आता पटू लागले आहे.




Ambareesh Phadnavis - 20 de agosto de 2013 - denunciar abuso

आगामी काळ कठीण आहे. २०२४ पर्यंत तरी कठीण आहे. २०१४-२०२४ हा बिकट काळ आहे. पाकिस्तानचे तीन तुकडे करणे वगैरे ठीक आहे, प्रॉब्लेम कसे करायचे हा आहे.
शैलेंद्रजी योग्य म्हणाले पण त्यात आणखीन एक पदर आहे जो त्यांनी सोडला आहे. पाकिस्तान च्या अस्तित्वाची सर्वात मोठी ग्यारंटी खुद्द दिल्ली स्थित भारतीय सत्तेने घेतली आहे. दिल्ली ची लॉबी (निव्वळ कॉंग्रेस नाही, तर भाजप चे देखील युपी आणि दिल्लीमधले काही नेते) पाकी लोकांशी पप्पी-झप्पी करत असते. जोवर हि लॉबी सत्तेत आहे, तोवर पाकिस्तान ला समूळ धक्का लावण्यात येणार नाही.
पाकिस्तान शी युद्ध म्हणजे चीन-अमेरिका-ब्रिटन या तीन देशांशी एकत्रित युद्ध आहे. भारताची ती तयारी नाही.
दिल्ली च्या या लॉबीला सत्तेत ठेवायला पाकिस्तान देखील एक लहान विजय भारताला देऊ शकतो. तुंडा चे हस्तांतरण देखील यातलाच एक भाग आहे.



निर्णायक लढाई किंवा संघर्ष कदाचित दहा वर्षांनी होईल.. तोवर काश्मीर आणि (किंवा) पूर्वोत्तर भारत हातचा गेलेला असेल आणि भारतात मोठ्या प्रमाणात रक्तपात, दंगली आणि गृहयुद्ध सदृश परिस्थिती उद्भवलेली असेल. जर भारतीयांनी (बहुतांश हिंदूंनी) तेव्हा जागे होऊन प्रत्याक्रमण सुरु केले (प्रत्येक पातळीवर, समजेल त्याच शब्दात आणि कृतीत) तर भारत परत गेलेला भाग परत मिळवू शकतो. प्रत्याक्रमण सामाजिक पातळीवर, गुंडांच्या पातळीवर, सामरिक पातळीवर, वैचारिक पातळीवर सर्वात मुख्य म्हणजे धार्मिक आणि सांप्रदायिक पातळीवर होणे आवश्यक आहे. आणि ते होईल. नाहीतर पाकिस्तान एकदा तोडून भारताला फारसे काहीही मिळाले नाही, फक्त दोन पाकिस्तान मिळाले. बांगलादेश हा दिल्लीच्या लॉबी साठी चांगला असेल, आसाम आणि बंगाली आणि मणिपुरी आणि त्रिपुरी लोकांसाठी, इथल्या हिंदूंसाठी आणि खुद्द बांगलादेशातल्या हिंदूंसाठी बिलकुल फरक नाही. त्यामुळे अजून तीन तुकडे केले कि बांगलादेश सारखे दिल्ली च्या सरकार शी मैत्री ठेवणारे तीन वेगळे देश तयार होती. दक्षिण आशिया खंडातल्या हिंदूंच्या नशिबातली साडेसाती काही संपणार नाही.
पण हे सगळे भीषण रक्तपातानंतर सुचलेली अक्कल असेल. पाकिस्तान चा बंदोबस्त करणे म्हणजे इस्लाम चे भारतीयीकरण आणि हिंदुकरण करणे.  हे महाराष्ट्रात सर्वांना आता पटणार नाही. पण किश्तवाड, कोक्राझार, बंगाल, केरळ, मेरठ, उत्तर-बिहार वगैरे ठिकाणी हिंदू लोकांना हे आता पटू लागले आहे.


पाकिस्तानी सेनेचा संपूर्ण विनाश (मी शारीरिक विनाश म्हणतोय) आणि तो मुलुख भारताच्या सेनेच्या संरक्षणाखाली ७०/८० वर्षे ठेऊन आणि तिथे विहिंप वगैरे संस्थांना संपूर्ण प्रोटेक्शन देऊन धर्मप्रसार केला कि २-३ पिढ्यांनंतर "कदाचित" धार्मिक लोकांची पैदावार तिथे सुरु होईल. तोवर भारताने आणि हिंदूंनी खमके राहणे आवश्यक आहे. त्या आधी गंगेच्या खोऱ्यात कार्यरत असलेले जिहादी नेटवर्क नेस्तोनाबूत करावे लागेल, मगच वरील पाउल उचलता येईल. आणि वरील पाउल उचलायला दिल्ली बाहेरचे नेते सत्तेत किमान दहा वर्षे तरी असायला हवेत जेणेकरून निवडणूक प्रक्रियेत आवश्यक त्या सुधारणा करून मतपेटी चे राजकारण कमी करता येईल.




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Ambareesh Phadnavis - 20 de agosto de 2013 - denunciar abuso

सिद्धेश, नाही.. एक खूप मोठा प्रॉब्लेम आहे या विचार प्रणाली मध्ये..
चीन भारताशी दीर्घकाळ मैत्री का करेल? चीन ला भारताकडून असे काय मिळेल जे आता मिळत नाही? जर दीर्घकाळ मैत्रीची कमिटमेंट न करता व्यापाराचे सगळे फायदे मिळत असतील तर मैत्रीची कमिटमेंट कुणी का करावी? वही सफेदी वही झाग कम दाम मे मिले तो कोई ये क्यू ले, वो न ले?
भौगोलिक दृष्ट्या पाकिस्तानच्या मदतीला अमेरिका सहज येऊ शकतो कारण सौदी, बहरैन आणि हिंदू-महासागरात दिएगो गार्सिया नावाच्या बेटावर अमेरिकेचे आणि इंग्लंड चे खूप मोठे लष्करी तळ आहे. अमेरिकेचे पाचवे आणि सातवे आरमार सिंधूसागरात तैनात आहे. जवळपास एक लक्ष सैनिक आहेत. त्यामुळे एक वेळ चीन नाही येऊ शकणार, अमेरिका सहज येईल..
अधिक अमेरिकेला प्रत्यक्ष काहीही करायची गरज नाही. मदत म्हणून जी रक्कम ते पाकिस्तान ला देतात ती रक्कम वापरून पाकिस्तान अमेरिकी शस्त्रास्त्रे, सामग्री, विमाने वगैरे विकत घेतो. या सगळ्यांना वरून अमेरिकी उपग्रहांचा सपोर्ट असतो. माझ्या काही सेनेतल्या ओळखीच्या लोकांनी मला सांगितले कि ऑपरेशन पराक्रम च्या वेळेस पाकिस्तानला अमेरिका भारतीय वायुसेनेबद्दल माहिती पुरवीत होता. माहिती म्हणजे खरी खुरी रियलटाईम इंटेलिजन्स.. कुठल्या भारतीय बेस वरून कुठल्या क्षणी कुठले विमान उडत आहे हे सगळे वरून उपग्रहांद्वारे बघून ती माहिती पाकिस्तान ला पुरवली तर आक्रमण करून फायदा काय?



सगळी लष्करी डावपेच कोलमडून पडतात जर तुमची प्रत्येक हालचाल शत्रू बघत असेल आणि तुम्ही ती बघू शकत नसाल तर.
भारत १/२ महिने चालणाऱ्या युद्धात कोलमडून पडेल. कारण आपले उत्पादन क्षेत्र फार कमकुवत आहे. पहिल्या झटक्यात काही शे विमाने, रणगाडे वगैरे निकामी झाली कि इंडस्ट्री ने तितक्या गतीने नवीन विमाने, रणगाडे वगैरे निर्मिती करून सेनेला तत्परतेने पुरवले पाहिजे. जर्मनी ५ वर्षे दोन आघाड्यांवर असा शुरतेने लढू शकला कारण त्यांचे उत्पादन क्षेत्र सॉलिड तगडे आहे.



सेवा क्षेत्रावर आधारित अर्थव्यवस्था युद्धतत्पर कधीही नसते. आपल्या कडे सध्या mechanical engineers, electrical engineers, गणितज्ञ, भौतिकशास्त्री, रसायनशास्त्री, भाषाशास्त्री वगैरे पोरांची खूप कमी आहे. सगळे पोरे सरसकट कम्प्युटर करतात आणि मग एम्बीए करतात. करियर म्हणून ठीक आहे, पण असे देश कधीही एक मोठी शक्ती म्हणून उभारू शकत नाहीत, सोरी..



रशिया कम्युनिस्ट नाही आहे. आणि त्यांची युद्ध करायची ऐपत नाहीये.
Ambareesh Phadnavis - 20 de agosto de 2013 - denunciar abuso
इंग्लंड आणि अमेरिकेचे कौतुक करावे तेव्हढे कमी आहे.
जगात कुठल्याच सत्तेने एका समूहाला असे सहजतेने नाही नाचवले जितक्या सहजतेने अमेरिका-इंग्लंड सुन्नी-मुस्लीम लोकांना नाचवते..
जेव्हा या १९२४ नंतर च्या कालखंडाचा इतिहास लिहिला जाईल तेव्हा तो इतिहासकार अमेरिकेचे आणि इंग्लंडचे (मुख्यत्वे इंग्लंड) तोंडभरून कौतुक केल्याशिवाय नाही राहणार आणि सुन्नी लोकांची चेष्टा केल्याविना नाही राहणार.. कुणी डोक्याने इतके पैदल कसे काय असू शकते, हा प्रश्न मला वारंवार पडतो.. हे लोक अमेरिकेला शिव्या तर घालतात पण त्यांच्याच मैला वाहतात आणि त्यासाठी वाट्टेल ते करतात..
Kaustubh Gurav - 20 de agosto de 2013 - denunciar abuso
जगात कुठल्याच सत्तेने एका समूहाला असे सहजतेने नाही नाचवले जितक्या सहजतेने अमेरिका-इंग्लंड सुन्नी-मुस्लीम लोकांना नाचवते..
+1
नचिकेत सुरेश गुरव - 21 de agosto de 2013 - denunciar abuso
@ ambareesh, shailendra
+1




SANDESH, HOW GREEN WAS MY VALLEY - 21 de agosto de 2013 - denunciar abuso


चीन आणि पाकिस्तानच्या चीथावण्या नैराश्यातून निर्माण झालेल्या आहेत सध्याच्या परिस्थितीत युरोपियन समूहातील देश
चीन च्या ऐवजी भारतामधून माल आयात करण्यास इच्छित आहेत. एकतर त्यांची मागणी थोडी कमी झालेली आहे आणि जेव्हढी त्यांची गरज आहे तितका माल एकटा  भारत त्याना पुरवू शकतो. बांगलादेशातून पण तिथे मोठ्या प्रमाणात निर्यात त होते शिवाय त्यांचा माल   थोडा स्वस्त पण आहे . पण तिथे राजकीय स्थैर्य नाही. तुलनेने भारतात ते आहे.  भारताला मिळणारा फायदा पाहून  चीन पाकिस्तान बांगलादेश या सगळ्यांच्या पोटात दुखणे स्वभाविक आहे. त्यामुळे भारतात अस्थिरता निर्माण करायचा प्रयत्न ही शेजारी राष्ट्रे करत आहेत. यांना पुरून उरायचं असेल तर आपसातील मतभेद विसरून एकजुटीने सामंजस्याने    लढा द्यायला हवा .

Friday, 18 November 2016

निरीश्वरवाद


 आपल्या भारतात निरीश्वरवादाची किती उज्ज्वल परंपरा आहे. ऋग्वेदापासून... हे सगळे जे तुम्ही टाकले आहे, ते अब्राहमीक संप्रदायाच्या संदर्भात आहे. धर्माच्या नाही. धार्मिक निरीश्वरवाद खूप क्लिष्ट असला तरी आपल्याला (भारतीय मनाला) खूप सहज समजण्यासारखा आहे..

उदाहरणार्थ, ऋग्वेद, मंडळ १०, सुक्त १२९ ज्याला पॉप्युलरली लोक "नासदीय सुक्त" म्हणून ओळखतात.. हे सुक्त भारतीय निरीश्वरवादाचे जनक म्हणता येईल..

नासदासीन नो सदासीत तदानीं नासीद रजो नो वयोमापरो यत |
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद गहनं गभीरम ||

 तेव्हां म्हणजे मुळारंभी असत् नव्हते आणि सत्ही नव्हतें! अंतरिक्ष नव्हतें आणि त्यापलीकडचें जे आकाश तेंही नव्हतें! (अशा स्थितींत) कोणीं (कोणाला) आवरण घातलें (म्हणावें)? कोठे? कोणाच्या सुखासाठीं? अगाध व गहन पाणी (तरी) होतें काय?

न मर्त्युरासीदम्र्तं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः |
आनीदवातं सवधया तदेकं तस्माद्धान्यन न परः किं चनास ||

तेव्हां मृत्यू म्हणजे मृत्युग्रस्त नाशवंत दृश्य सृष्टी नव्हती, व म्हणून (दुसरा) अमृत म्हणजे अविनाशी नित्य पदार्थ (हा भेद) हि नव्हता. (तसेंच) रात्र आणि दिवस यांचा भेद कळण्यास कांहीं साधन (=प्रकेत) नव्हतें. (जें काय होतें) ते एकलें स्वधेनें म्हणजे आपल्या शक्तीनें वायूशिवाय श्वासोच्छ्वास करीत म्हणजे स्फुरत होतें. त्याखेरीज किंवा त्यापलीकडे दुसरें असे कांहींच नव्हतें.

तम आसीत तमसा गूळमग्रे.अप्रकेतं सलिलं सर्वमािदम |
तुछ्येनाभ्वपिहितं यदासीत तपसस्तन्महिनाजायतैकम ||

अंधकार होता, आरंभी हे सर्व अंधकाराने  व्याप्त (आणि) भेदाभेदविरहित पाणी होतें, (किंवा) आभू म्हणजे सर्वव्यापी ब्रह्म (आरंभींच) तुच्छानें म्हणजे फोल मायेने आच्छादिलेले होते - असें (यत्) जें (म्हणतात), तें (तत्) मूळ एक (ब्रह्मच) तपाच्या महिम्यानें (रूपांतरानें पुढें) प्रकट झालेले होतें.

कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः परथमं यदासीत |
सतो बन्धुमसति निरविन्दन हर्दि परतीष्याकवयो मनीषा ||

याच्या) मनाचे जें रेत म्हणजे बीज प्रथमत: निघालें तोच आरंभी काम (म्हणजे सृष्टि निर्माण करण्याची प्रवृत्ति किंवा शक्ती) झाला. (हाच) असतामध्यें म्हणजे मूळ परब्रह्मांत सताचा म्हणजे विनाशी दृश्य सृष्टीचा (पहिला) संबंध होय, असें ज्ञात्यांनी अंत:करणांत विचार करून बुद्धीनें निश्चित केले आहे.

तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः सविदासी.अ.अ.अत |
रेतोधाासन महिमान आसन सवधा अवस्तात परयतिः परस्तात ||

(हा) रश्मी म्हणजे धागा किंवा किरण यांच्या (मध्यें) आडवा पसरला; आणि खालीं होता म्हटलें तर वरहि होता. (यांच्यातलें काही) रेतोधा म्हणजे बीजप्रद झाले, व (वाढून) मोठेही झाले. त्यांचीच स्वशक्ति अलीकडे व प्रयति म्हणजे प्रभाव पलीकडे (व्यापून) राहिला.

को अद्धा वेद क इह पर वोचत कुत आजाता कुत इयंविस्र्ष्टिः |
अर्वाग देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यताबभूव ||

सताचा) हा विसर्ग म्हणजे पसारा कशापासून किंवा कोठून आला, हें (यापेक्षां) प्र म्हणजे विस्तारानें येथें कोण सांगणार? कोण निश्चयात्मक जाणतो देवही या (सत् सृष्टीच्या) विसर्गानंतरचे. मग ती जेथून निघाली तें कोण जाणणार?

इयं विस्र्ष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न |
यो अस्याध्यक्षः परमे वयोमन सो अङग वेद यदि वा नवेद ||

सताचा) हा विसर्ग म्हणजे पसारा जेथून झाला, किंवा तो निर्मिला गेला अगर न गेला, तें परम आकाशांत असणारा या जगाचा जो अध्यक्ष (हिरण्यगर्भ) तो जाणीत असेल; किंवा नसेलही! (कोणी सांगावें?)



वसंत देव कृत प्रसिद्ध हिंदी भाषांतर
सृष्टी से पहले सत् नहीं था।
असत् भी नहीं।
अन्तरिक्ष् भी नहीं। आकाश भी
नहीं था।
छिपा था क्या? कहाँ? किसने ढका
था?
उस पल तो अगम-अतल जल भी कहाँ
था?।। १।।

नहीं थी मृत्यू थी अमरता भी
नहीं।
नहीं था दिन रात भी नहीं।
हवा भी नहीं साँस थी स्वयमेव
फिर भी।
नही था कोई कुछ भी। परमतत्त्व
से अलग या परे भी।। २।।

अंधेरे में अंधेरा-मुँदा
अँधेरा था।
जल भी केवल निराकार जल था।
परमतत्त्व था सृजन-कामना से
भरा। ओछे जल से घिरा।
वही अपनी तपस्या की महिमा से
उभरा।। ३।।

परम मन में पहला बीज जो उगा वही
काम बनकर जगा।
कवियों-ज्ञानियों ने जाना।
असत् और सत् का निकट सम्बन्ध
पहचाना।। ४।।

फैले सम्बन्ध के किरण-धागे
तिरछे।
परमतत्त्व उस पल ऊपर या नीचे?
वह था बँटा हुआ। पुरुष और
स्त्री बना हुआ।
ऊपर था दाता वही भोक्ता। नीचे
वसुधा स्वधा भोग्या।। ५।।

सृष्टी यह बनी कैसे? किससे? आई
है कहाँ से?
कोई क्या जानता है? बता सकता है?
देवताओं को नहीं ज्ञात, वे आए
सृजन के बाद।
सृष्टी को रचां है जिसने उसको
जाना है किसने?।। ६।।

सृष्टी का कौन है कर्ता? कर्ता
है अथवा अकर्ता?
ऊँचे आकाश में जो रहता। सदा
अध्यक्ष जो बना रहता।
वही सचमुच में जानता या नहीं
जानता।
इसका किसी को नहीं पता नहीं है
पता।। ७।


आस्तिक ते जे वेदप्रामाण्य मानतात.. नास्तिक ते जे वेदप्रामाण्य मानीत नाहीत..

आस्तिक निरीश्वरवादी मते - सांख्य, न्याय, पूर्वमीमांसा, वैशेषिक, काही प्रमाणात योग
आस्तिक सेश्वरवादी मते - वेदांत, काही प्रमाणात योग
नास्तिक निरीश्वरवादी मते - बौद्ध, जैन, चार्वाक
नास्तिक सेश्वरवादी मते - शीख/ गुरुमत


उपरोक्त नासदीयस ुक्त हे आधुनीक शास्त्र जे BIG BANG ची थेरी मांडत त्याच्याशी जवळीक साधत.


ओर्कुत्वरून निश्रेयस साभार प्रस्तुत 

Friday, 11 November 2016

Four Pillars of india

भारतात अनेक अश्या व्यक्ती झाल्या कि ज्यांचे कर्तृत्व असामान्य आहे. त्या ज्या क्षेत्रात काम केले ते मैलाचा दगड ठरले. आजही त्या हजारो व्यक्तींना १०० करोड व्यक्ती आदर्श मानत आहेत आणि राहतील. थोडक्यात भारतभूचे सुपूत्र या सदरात ते येतात. मात्र भारतभूचे सुपूत्र होणे इतके सोपे आहे का? प्रचंड उलथापालथी नंतर भारताच्या सुपूत्रांपैकी ४ जण माझ्या डोळ्यांसमोर रात्रं-दिवस येत आहेत. आणि सर्वात महत्वाची गोष्ट म्हणजे त्यांच्या आधी आणि त्यांच्या नंतर भारतात किंवा भारता बाहेर हजारो आदरणीय व्यक्ती झाल्या वा होतील पण या चौघांचे स्थान एकमेवाद्वितीय आहे.
या चौघांचाहि कालखंड भिन्न आहे. हे चौघही उत्तर-दक्षीण-पूर्व-पश्चीम अश्या भारताच्या ४ टोकांतुन जन्मले मात्र त्यांचा प्रभाव संपूर्ण भारतभर पसरला आहे. या पैकी एकाने तर भारताच्या सीमाहि ओलांडल्या आहेत. भारताचा इतिहास या चार व्यक्तींशिवाय कदापि पूर्ण होणार नाहि इतके अलौकीक-प्रचंड आणि विस्मयकारक काम त्यांनी करुन ठेवलय.



ही चौघाच डोळ्यासमोर का आली?? तर याचं पहिलं उत्तर "माहित नाहि!" असंच आहे. मात्र विचारांती थोडस तुटक आणि अंधुक उत्तर मिळत - "हे चौघही उत्तम विध्यार्थी होते, हे चौघही उत्तम गुरु होते, हे चौघही द्रष्टे होते आणि महत्वाचं म्हणजे ह्या चौघांकडे "चारीत्र्य" होते, शुचिता होती." या चार गुणांमुळेच आपले सुस्पष्ट ध्येय आणि अढळ निष्ठा त्या चौघांकडे होती. त्यांचा जन्म ही त्या काळची गरजच होती. आणि काळाची गरज म्हणण्यापेक्षाही जणु काळाने/नियतीने यांचा जन्म होणारच अशी मांडणी केली होती. एखाद्या महानाट्यात एका पात्राने रंगमंचावर प्रवेश करावा आणि बघता बघाता त्या संपूर्ण रंगमंचाचा ताबा घेउन लोकांना स्तिमीत कराव, तसे ते चौघे आले - त्यांनी पाहिलं - त्यांनी जिंकल. विष्णुच्या अवतार संकल्पनेवर कोणाचा विश्वास बसला नाहि तरी हे चार अवतारच असावेत असे यंच्या ’इतिहासाकडे’ बघुन पटत.



वर म्हंटल्याप्रमाणे हे चौघ उत्तम विद्यर्थी होते, आणि ते ज्या गुरुकुलाचे अथवा गुरुचे शिष्य होते मुळात त्याच व्यक्ती असामान्य होत्या. आणि उलट त्या गुरुकुलाचे अथवा गुरुचे शिष्य बनण्यासाठी त्या ’शिष्यांची’ पात्रता असणं जास्त महत्वाचं होतं. या चार जणांच्या गुरुकुलाच्या अथवा गुरुच्या प्रभावाखाली-छत्राखाली कदाचित इतरही हजारो जण शिकले असतीलही, पण मग हेच चौघ का? हा प्रश्न जास्त महत्वाचा आहे. याचेच उत्तर म्हणजे सर्वोत्तम विद्यार्थी असणे हा गुण उपजतच त्यांच्यात होता. ते जे शिकले ते त्यांनी आचरणात आणलं त्याने इतरांचं भलं कसं होईल याचा विचार केला. त्यानी आपल्या गुरुंचे पांग फेडले.



पुढे ते स्वत: गुरु झाले आणि आपलं कार्य चालवणारी अनेक माणसे त्यांनी घडवली. या पैकी दोघांनी राजकारणात येणार्या पिढ्यांना पाठ घालुन दिले तर इतर दोघांनी समाजकारणात. आणि त्यांचा कालखंडही आलटुन पालटुन आहे. म्हणजे सर्वप्रथम राजकारण मग समाजकारण मग परत राजकारण आणि सरते शेवटी समाजकारण अशी कालानुरुप मार्गदर्शक तत्वे आणि क्रिया त्यांनी त्यांच्या क्षेत्रात घडवल्या. यापैकी पहिल्या दोघांचा कालखंड हा हजार वर्षांच्या अंतराने आलाय मग परत हजार वर्षे गेली आहेत आणि शेवतच्या दोघांत फक्त काहि शे वर्षांचे अंतर आहे. सगळं कसं अगदी ठरल्या सारखं घडत गेलय. इथे मी समाजकारण आणि धर्म हे एकमेकांत गुंतले असल्यानं संपुर्ण प्रक्रीयेलाच समाजकारण म्हंटलं आहे. त्यात "लोकांनी धारण केलेला आहे तो अथवा जो लोकांनी धारण करतो तो ’धर्म’" या व्याख्येचा वापर अपेक्षीत आहे. म्हणुन त्यातील दोघंजण हे धर्माचे पालन अथवा समाजकारणच करत होते असं म्हणता येईल. उरलेल्या दोघांनीही देव-देश-धर्म यांना दैनंदिन जीवनात अनन्यसाधारण महत्व दिल्याचं दिसतं.
आता "द्रष्टा" म्हणाजे काय ते या चारही जणांकडे बघुन समजतं. क्षणभंगुर सुखाच्या मागे धावणारा सामान्य माणुस हा शक्यतो मी-माझा या पलिकडे विचार करत नाहि. काळाची पाऊले त्याला ओळखता येत नाहित. उलट ती ओळखता येत नाहित म्हणुनच तो सामान्य ठरतो. मेंढरासारखे एकाच्या मागे दुसरा त्यामागे तिसरा असे करत आयुष्य घालवतो. मात्र समाजाच्या आखुन दिलेल्या चौकटितुन काहि माणसे बाहेर पडतात, त्यांना काळाची पाऊले ओळखता देखिल येतात. तशी ते आपली कृती ठरवतात ज्याने संपूर्ण राष्ट्राचे भवितव्य उज्वल होते, त्यांनाच "द्रष्टा" म्हणता येईल. नुसता ’नेता’ होणेच कर्मकठीण आहे "द्रष्टा" होणे तर दुरच राहो. मात्र ही चार व्यक्तीमत्वे उपजतच द्रष्टेपण घेउन आली होती असे म्हंटल्यास वावगे ठरु नये.



आणि त्यांच्याकडे द्रष्टेपण होतं म्हणुनच ते समर्थ नेतृत्व करु शकले. शेकडो वर्षांनंतरचा विचार करुन त्यांनी आपली धोरणे आखली ती राबवली, कदाचित म्हणुनच तत्कालीन समाज अथवा त्या नंतरच्या पिढ्या तग धरुन राहु शकल्या. अन्यथा बाबिलोनियन, माया, पारसिक, रोमन, ग्रीक, इजिप्शीयन अश्या प्रचंड मोठ्या संस्कृतींच्या वा साम्राज्यांच्या यादित भारत किंवा हिंदु संस्कृतीचे नाव आले असते. या चौघांपैकी दक्षीणेतील द्रष्ट्याने तर उभ्या हिंदु धर्मावर हिमालया इतके कधीहि न फिटणारे उपकार करुन ठेवले आहेत. तर पश्चीमेकडील द्रष्टा तर ’हिंद्दुहृदयसम्राट’ बनला असे कार्य करुन गेलाय.
"चारीत्र्य" हे तर यांच महत्वाचं बलस्थान. माया-मदिरा-स्त्री यांच्या आहारी ते कधीच गेले नाहित. या चार जणांतील तिघे तर आजन्म ब्रह्मचारी राहिले तर चौथा संसारी असला तरी आपल्या संसाराला आपल्या आयुष्यात गरजेपेक्षा जास्त स्थान त्याने कधीच दिले नाहि. आणि अगदी शत्रुनेही "स्त्री-दाक्षीण्य" या गुणाबाबत त्यावरुन आपले सर्वस्व ओवाळुन टाकावे इतकी शुचिता त्याच्याकडे होती.



वरील पूर्ण लेखामधुन "ते" चौघे कोण हे सुज्ञांच्या लक्षात आलेही असेल. मात्र त्यांच्या कालखंडानुसार मी त्यांची नावे प्रकट करतो - "आर्य चाणक्य, आदि शंकराचार्य, छत्रपति शिवाजी महाराज आणि स्वामी विवेकानंद" वरील प्रत्येक गोष्ट त्यांच्या बाबत चपखल बसते.
तक्षशीला गुरुकुल असो, जिजाऊसाहेब असोत अथवा रामकृष्ण परमहंस असोत यांचे शिष्यत्व पत्करणं म्हणजे शिवधनुष्य पेलण्यासारखं आहे. आणि नुसतं पेलुन फायदा नाहिये तर त्यावर आपल्या कार्याची प्रत्युंचा देखिल चढवता आली पाहिजे.
मुळात भारतभू हि पुण्यभूमी असल्याने असे सुपुत्र तिच्या पोती जन्माला आले. आणि ते केवळ भारतभुमीचे सदभाग्य नसुन या चौघांचेही सुदैव आहे असेच म्हणावे लागेल कारण राष्ट्रापेक्षा कोणीचि मोठा नसतो हीच त्यांची शिकवण आहे. तरीही त्यांचे स्थान ध्रुवाप्रमाणे अढळ आहे. ज्याला ’भारत’ समजुन घ्ययचा असेल त्याने या चौघांचे चरीत्र समजुन घेण्याचा प्रयत्न करावा. कारण ह्या चौघांच्या चरीत्राचा एल लक्षांश अर्थ जरी समजला आणि त्या समजलेल्या चरीत्राच्या शतांशा इतकाहि त्यांछा किमान एक गुण आपण आपल्यात उतरवु शकलो तरी ’भारत’ समजला असे म्हणायला हरकत नाहि. नुसते ’मेरा भारत महान!’ असे वर्षातुन दोनदा म्हणायच आणि मग आपल्या कृतीने आपल्या देशाला कमीपणा येईल असे वागायचे याला भारत समजला असे नाहि म्हणता येत.
चाणक्याचं द्रष्टेपण, शंकराचार्यांचे ज्ञान, शिवरायांची शुचिता आणि विवेकानंदांची निष्ठाच भारताला महासता बनवु शकते. यातले दोन जण "योद्धा संन्यासी" होते, एक "महागुरु" होता आणि एक जण "श्रीमंत योगी" होता. ’राजयोग आणि कर्मयोग’ यांच अजब मिश्रण त्यांच्या व्यक्तीमत्वात होतं. यांनी ठरवलं असतं तर जगातली सर्व सुखं त्यांच्या पायाशी सहज आली असती. मात्र यांनी ’सोन्याचे पलंग’ वापरल्याचं कोणी ऐकले नाहिये. त्यांनी कधी कोणाचे वाईट केले नाहि. मात्र आपल्या मातृभूमीवर होणारे अत्याचार थांबवुन तिला संपन्न करण्यासाठी शक्य ते उपाय योजल्यांच दिसतं थोडक्यात या चौघांना "आचरल्यास" भारत महासत्ता होणार हि काळ्या दगडावरची रेघ आहे.एक दिवस भारताच्या महसत्तेचा तारा क्षीतीजावर पुन: उगवल्याशिवाय नाहि राहणार.




found at सहज सुचलं म्हणून a blog by mr.saurabh vaishampayan 

Thursday, 10 November 2016

आतंकवादाचा जन्मदाता



*Trump's first day at the Oval Office after being elected President.*
 
First briefing by the CIA, Pentagon, FBI:
Trump: We must destroy ISIS immediately. No delays.
CIA: We cannot do that, sir. We created them along with Turkey, Saudi, Qatar and others.


Trump: The Democrats created them.
CIA: We created ISIS, sir. You need them or else you would lose funding from the natural gas lobby.




Trump: Stop funding Pakistan. Let India deal with them.
CIA: We can't do that.
Trump: Why is that?




CIA: India will cut Balochistan out of Pak.
Trump: I don't care.
CIA: India will have peace in Kashmir. They will stop buying our weapons. They will become a superpower. We have to fund Pakistan to keep India busy in Kashmir.




Trump: But you have to destroy the Taliban.
CIA: Sir, we can't do that. We created the Taliban to keep Russia in check during the 80s. Now they are keeping Pakistan busy and away from their nukes.
Trump: We have to destroy terror sponsoring regimes in the Middle East. Let us start with the Saudis.




Pentagon: Sir, we can't do that. We created those regimes because we wanted their oil. We can't have democracy there, otherwise their people will get that oil - and we cannot let their people own it.


Trump: Then, let us invade Iran.
Pentagon: We cannot do that either, sir.
Trump: Why not?


CIA: We are talking to them, sir.
Trump: What? Why?
CIA: We want our Stealth Drones back. If we attack them, Russia will obliterate us as they did to our buddy ISIS in Syria. Besides we need Iran to keep Israel in check.


Trump: Then let us invade Iraq again.
CIA: Sir, our friends (ISIS) are already occupying 1/3rd of Iraq.


Trump: Why not the whole of Iraq?
CIA: We need the Shi'ite govt of Iraq to keep ISIS in check.
Trump: I am banning Muslims from entering US.


FBI: We can't do that.
Trump: Why not?


FBI: Then our own population will become fearless.
Trump: I am deporting all illegal immigrants to south of the border.


Border patrol: You can't do that, sir.
Trump: Why not?


Border patrol: If they're gone, who will build the wall?
Trump: I am banning H1B visas.


USCIS: You cannot do that.
Trump: Why?
Chief of Staff: If you do so, we'll have to outsource White House operations to Bangalore. Which is in India.
Trump (sweating profusely by now): What the hell should I do as President??? 😰


CIA: Enjoy the White House, sir! We will take care of the rest!
😂😂😂


खरे आतंकवादी तर हे साम्राज्यवादी अमेरिकन व यूरोपियन लोक आहेत आपण उगान पाकडयांना दोष देतो

पांढरपेशे evangelists




कलबुरगी और दाभोलकर की हत्या के बाद पूरे देश में जैसे तर्कवाद की लहर फैला दी थी सेक्युलरो ने । सम्पूर्ण भारतीय परंपरा और धर्म साहित्य को अंधविश्वास बता कर मजाक उड़ाया जाने लगा । शंकराचार्य से लेकर रामदेव और श्री श्री रविशंकर , सभी संतो का अपमान बुद्धिजीविता का पैमाना बन गया। शरद यादव ने जहाँ शिव भक्तों को बेरोजगार कह कर अपनी बुद्धिजीविता बढ़ाई वहीँ आमिर खान ने दुग्ध अभिषेक को बर्बादी कह दिया । फ़िल्म PK में तो भारत की सनातनी परम्पराओ का भद्दा मजाक बना कर राजकुमार हिरानी और आमिर दोनों ही सेक्युलरो के तार्किक नेता ही बन बैठे ।
पर अब क्या इन सबकी तार्किकता घास चरने चली गयी ।
मदर टेरेसा , मेरे लिए सिर्फ अल्बानियाई एग्नेस , को पोप द्वारा संत घोषित करने पर ये नेता ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे । ममता , कजरी लाइन लगा कर वहा उपस्थिति दे रहे हैं । कोई टेरेसा के चमत्कार की बात पर प्रश्न नहीं कर रहा । अखबार वाले कवर स्टोरी में टेरेसा को भारत भाग्य विधाता की छवि दे रहे हैं ।
तर्क गया विश्राम करने । भारतीय संतो के आते ही तर्क की निद्रा भंग हो जायेगी ।
ये मत भूलना भाइयो की टेरेसा ने क्रूर तानाशाहों को सराहा , उनसे पैसे लिए और वो पैसे ईसाई धर्म के प्रचार में खर्च करती रही ।
टेरेसा से कहीं अधिक ममतामयी सेवाभावी माँ शारदा देवी , अमृतानंदमयी माँ अम्मा , वात्सल्य की प्रतिमूर्ति ऋतंभरा को सन्त बनाया नहीं जाता क्यू की वो संत स्वाभाविक रूप से हैं ।
भारत को मदर टेरेसा जैसे ईसाई संतों की आवश्यकता नहीं क्यू की उसी रोम के पोप द्वारा घोषित संत ज़ेवियर के भारत के गोआ और महाराष्ट्र में किये गए अमानवीय अत्याचार की कहानियां भुलाई नहीं जा सकी हैं ।
जय भारत।
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           *क्या मदर टेरेसा संत थीं?*
                             -- डॉ. वेदप्रताप वैदिक

केथोलिक संप्रदाय के विश्व-गुरु पोप फ्रांसिस आज मदर टेरेसा को संत की उपाधि प्रदान करेंगे। मदर टेरेसा भारतीय नागरिक थीं। इसलिए उन्हें कोई संत कहे और विश्व-स्तर पर कहे तो क्या हमें अच्छा नहीं लगेगा? वैसे भी उन्हें भारत-रत्न और नोबेल पुरस्कार भी मिल चुका है। उनके योगदान पर कई पुस्तकें भी आ चुकी हैं और छोटी-मोटी फिल्में भी बन चुकी हैं।
लेकिन मेरे मन में आज यह जिज्ञासा पैदा हुई कि मालूम करुं कि केथोलिक संप्रदाय में संत किसे घोषित किया जाता है? संत किसे माना जाता है? दो शर्तें हैं। एक शर्त तो यह है कि जो ईसा मसीह के लिए अपना जीवन समर्पित करे और दूसरी यह कि जो जीते-जी या मरने के बाद भी कम से कम दो चमत्कार करे। टेरेसा ने ये दोनों शर्तें पूरी की हैं। इसीलिए पूरी खात्री करने के बाद रोमन केथोलिक चर्च आज उन्हें ‘संत’ की सर्वोच्च उपाधि से विभूषित कर रहा है।
जहां तक ‘चमत्कारों’ की बात है, यह शुद्ध पाखंड है। विज्ञान, विवेक और तर्क की तुला पर उन्हें तोला जाए तो ये चमत्कार शुद्ध अंधविश्वास सिद्ध होंगे। टेरेसा का पहला चमत्कार वह था, जिसमें उन्होंने एक बंगाली औरत के पेट की रसौली को अपने स्पर्श से गला दिया। उनका दूसरा चमत्कार माना जाता है, एक ब्राजीलियन आदमी के मष्तिष्क की कई गांठों को उन्होंने गला दिया। यह चमत्कार उन्होंने अपने स्वर्गवास के 11 साल बाद 2008 में कर दिखाया। ऐसे हास्यास्पद चमत्कारों को संत-पद के लिए जरुरी कैसे माना जाता है? ऐसे चमत्कार सिर्फ ईसाइयत में ही नहीं हैं, हमारे भारत के हिंदू पाखंडी, स्याने-भोपे और बाजीगर भी दिखाते रहते हैं और अपनी दुकानें चलाते रहते हैं।
जहां तक मदर टेरेसा की मानव-सेवा की बात है, उसकी भी पोल उन्हीं के साथी अरुप चटर्जी ने अपनी किताब में खोलकर रखी है। उसने बताया है कि मदर टेरेसा का सारा खेल मानव-करुणा पर आधारित था। वे अपने आश्रमों में मरीजों, अपंगों, नवजात फेंके हुए बच्चों, मौत से जूझते लोगों को इसलिए नहीं लाती थीं कि उनका इलाज हो सके बल्कि इसलिए लाती थीं कि उनकी भयंकर दुर्दशा दिखाकर लोगों को करुणा जागृत की जा सके। उनके पास समुचित इलाज की कोई व्यवस्था नहीं थी और मरनेवालों के सिर पर पट्टी रखकर उन्हें वे छल-कपट से बपतिस्मा दे देती थीं याने ईसाई बना लेती थीं। मरते हुए आदमी से वे पूछ लेंती थीं कि ‘क्या तुमको स्वर्ग जाना है?’ इस प्रश्न के जवाब में ‘ना’ कौन कहेगा? ‘हां’ का मतलब हुआ बपतिस्मा। किसी को दवा देकर या पढ़ाकर या पेट भरकर बदले में उसका धर्म छीनने से अधिक अनैतिक कार्य क्या हो सकता है? कोई स्वेच्छा और विवेक से किसी भी धर्म में जाए तो कोई बुराई नहीं है लेकिन इस तरह का काम क्या कोई संत कभी कर सकता है? 1994 में लंदन में क्रिस्टोफर हिचंस और तारिक अली ने एक फिल्म बनाई, जिसमें मदर टेरेसा के आश्रमों का आंखों देखा हाल दिखाया गया था। हिचंस ने फिर एक किताब भी लिखी। उसमें बताया कि कैसे हैती के बदनाम और लुटेरे तानाशाह ज्यां क्लाड दुवालिए से टेरेसा ने सम्मान और धनराशि भी हासिल की। लंदन के राबर्ट मेक्सवेल और चार्ल्स कीटिंग-जैसे अपराधियों से उन्होंने करोड़ों रु. लिये। उन्होंने आपात्काल का समर्थन किया और भोपाल गैस-कांड पर लीपा-पोती की। धन्य है, मदर टेरेसा, जिनके संत बनने पर हमारे भोले प्रचार प्रेमी नेता वेटिकन पहुंच गए हैं।