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Tuesday, 14 November 2017

नेहरूंच्या भारताला अमुल्य देणग्या...........!


गांधी नेहरुच्या  गुलामांनो आतातरी डोळे उघडा .........! 






प्रस्तुत दाखले हे महान लेखक डॉ. नी.र. वऱ्हाडपांडे यांची नेहरुवाद या पुस्तकातील असून हे पुस्तक माझ्याकडे आहे.... शिवाय हे लेखक ९४ वर्षांचे होऊन गेल्या वर्षी निर्वतले .... रक्षा मंत्रालयात सचिव स्तरावर यांनी नेहरुकालात खूप दीर्घ काम केलेले आहे... पुढे लेखकांचा परिचय देतो..त्यावरून त्यांचे अष्टपैलू व्यक्तिमत्व आणि महत्ता सिद्ध होते..........





Saturday, 11 November 2017

राजकारण : एक मृगजळ।

‬: हिटलर एक बार अपने साथ संसद में एक मुर्गा लेकर आये,
और सबके सामने उसका एक -एक पंख नोचने लगे,
 मुर्गा दर्द से बिलबिलाता रहा मगर,
एक-एक करके हिटलर ने सारे पंख नोच दिये,
 फिर मुर्गे को फर्श पर फेंक दिया,
फिर जेब से कुछ दाने निकालकर मुर्गे की तरफ फेंक दिए और चलने लगा,
तो मुर्गा दाना खाता हुआ हिटलर पीछे चलने लगा,
 हिटलर  बराबर दाना फेंकता गया और मुर्गा बराबर दाना मु्ँह में ड़ालता हुआ उसके पीछे चलता रहा।
आखिरकार वो मुर्गा हिटलर के पैरों में आ खड़ा हुआ।
हिटलर स्पीकर की तरफ देखा और एक तारीख़ी जुमला बोला,
"लोकतांत्रिक देशों की जनता इस मुर्गे की तरह होती है,
उनके हुकमरान जनता का पहले सब कुछ लूट कर उन्हें अपाहिज कर देते हैं,
और बाद में उन्हें थोड़ी सी खुराक देकर उनका मसीहा बन जाते हैं"।
*This is our position at present...*.
2019 के लिए तैयार रहें। बहुत जल्द जनता को दाने फेके जाएंगे।

30 दिसंबर, 1943: ब्रिटिशराज से भारत की घोषित आजादी का पहला दिन

: 30 दिसंबर, 1943: ब्रिटिशराज से भारत की घोषित आजादी का पहला दिन






एक ऐसा दिन जिसे भारतीय इतिहास के पन्नों से बिलकुल गुम सा कर दिया गया। स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले अमर क्रांतिकारियों की सफलता के इस दिन को क्या सरकार,क्या जनता और क्या मीडिया सभी ने पूरी विस्मृत कर दिया। किसी ने सच ही कहा है “इतिहास जंग याद रखता है शहीद नहीं।”
आज से ठीक 72 वर्ष पूर्व भारत के दक्षिणी-पूर्वी अंडमान निकोबार द्वीप समूह से देश की आजादी की घोषणा की गयी थी।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फ़ौज ने अंग्रेजों के कब्जे से पूर्वी भारत के कई द्वीपों को आजाद करवा लिया। और आज के ही दिन वहाँ भारत के प्रतिनिधिकर्ता के रूप में आजाद हिन्द फ़ौज के ध्वज को फहराया गया।
नेताजी के नेतृत्व में हुई अस्थाई भारत सरकार की घोषणा
5 जुलाई 1943 को आजाद हिन्द फ़ौज की कमान सँभालते ही सुभाषचंद्र बोस ने सेना से ‘दिल्ली’ कूच करने का आह्वाहन किया। पूर्वी भारत के कोहिमा और इम्फाल के रास्ते विजय अभियान के शुरुआत की गयी।






महीनो संघर्ष के बाद 21 अक्टूबर को अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी गयी।
अंततोगत्वा कई अन्य द्वीपों को मिलाकर 30 दिसंबर 1943 को इन द्वीपों पर भारतीय ध्वज फहरा कर आजाद भारतीय सरकार की घोषणा की गयी।
15 अगस्त 1947 को ‘दान’ और ‘कृपा’ में प्राप्त विभाजनकारी रक्तरंजित फव्वारों से लफेंदी आजादी से पूर्व दिसंबर 1943 में परतंत्र भारत के पहले आजाद क्षेत्र ‘स्वराज’ द्वीप को जापान,जर्मनी,कोरिया,फिलीपींस,इटली यहाँ तक की चीन सहित सभी पूर्वी एशियाई देशों ने मान्यता दे दी।
हालाँकि इनमें से ज्यादातर राष्ट्र ब्रिटिशों के विरोधी थे शायद इसीलिए भारतीय इतिहास के अंग्रेज लेखकों ने इस आजादी को ‘आजादी’ मानने से इंकार कर दिया। यह ऐसी जीत थी जो लड़कर और फिर जीतकर हाँसिल की गयी थी.चालीस हजार से ज्यादा वीर-वीरांगनाओ के शौर्य और बलिदान की वेदी से प्रस्फुटित पहली आजादी को इतिहास में इस ‘भेदभाव’ की दृष्टि से देखा जाएगा इसकी कल्पना सुभाष बाबू को कतई न रही होगी।




ये माना जा सकता है की ये आजादी पूर्ण नहीं थी और एक छोटे द्वीप समूह तक ही सीमित रह गयी थी। परन्तु यह ‘भीख’ भी नहीं थी इसे चापलूसी से नहीं वरन शौर्य और आत्मबल से प्राप्त किया गया था। इतिहास गवाह है की इसके बाद भी भारतीय शूरवीरों ने भारतमाता के स्वाधीनता के लिए प्रयास करते हुए अंग्रेजों पर जोरदार हमले किये। परन्तु अंग्रेजो के इंडियन एजेंट्स (जो की ‘नपुंसकत्व’ को अहिंसा करार दे रहे थे) ने इन रणबाँकुरों को सहयोग करने से मना कर दिया। इस प्रकार सुभाष बोस द्वारा स्वाभिमान से आजादी प्राप्त करने का सपना चूर-चूर हो गया।
अपने खून की कीमत पर भारत को आजाद करने की कसम खाने वाले देशभक्त योद्धाओं के योगदान को संकुचित राजनीति के तहत कागज़ के कुछ पन्नो में समेत दिया गया। ये वही महानतम योद्धा थे जिनके बारे में हिटलर कहता था की “यदि ये मेरे साथ हो जाएँ तो मै समूचे विश्व को जीत लूँगा।” हमारा दुर्भाग्य है की भारतीय इतिहास के इस सुनहरे अध्याय को आम भारतीय जनमानस से छुपा दिया गया वो भी इसलिए ताकी सुभाष बाबू और आजाद हिन्द फ़ौज को सिर्फ एक बाहरी सेना के रूप में दर्शाया जा


30 दिसंबर का दिन सहसत्राब्दियों से शौर्य और पराक्रम से युत भारतीय भूमि पर मढी हुई नपुंसकता और जड़ता के कलंक को धोने का दिन हैं। आज सुभाष बाबू और उनकी करिश्मायी सेना हमारे बीच नहीं है परन्तु उनका आत्मबल और तेज हमें आज भी प्रकाशित कर रहा है।

डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर और इस्लाम’*



डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर जी का भारत की राष्ट्रीय धारा का भरपूर अभ्यास था. उनके प्रबंध का  विषय ही था, ‘भारत के राष्ट्रीय लाभांश का इतिहासात्मक और विश्लेषणात्मक अध्ययन’ (The National Divident of India – A Historical and Analytical Study). अर्थात, भारत का इतिहास, उस इतिहास की विभिन्न सामाजिक धाराएं, उनमे आयी हुई विकृतियां, मुस्लिम आक्रांता, उन आक्रान्ताओंने किया हुआ विध्वंस, इन सभी विषयों पर बाबासाहब का गहरा अध्ययन था. और इन विषयों पर उन्होंने अपनी राय हमेशा ही बेबाक ढंग से रखी हैं.


२८ दिसंबर, १९४० को उनका Thought on Pakistan यह पुस्तक प्रकाशित हुआ. उस समय तक पाकिस्तान का मुद्दा गरमाया तो था, लेकिन राष्ट्रीय बहस का विषय नहीं बना था. पुस्तक प्रकाशित होने के समय दूसरा विश्वयुध्द प्रारंभ हो चुका था. इस पृष्ठभूमि पर इस पुस्तक में बाबासाहब ने इस्लाम और पकिस्तान के बारे में किसी की परवाह न करते हुए, निर्भीकता के साथ खरी खरी सुनायी हैं. *उन्होंने विभाजन का समर्थन किया हैं. इस्लाम से ‘छुटकारा’ पाने के लिए विभाजन कितना आवश्यक हैं, इस बात को बार बार दृढ़ता के साथ रखा हैं. मुसलमानों के साथ हिन्दुओं का सह अस्तित्व संभव ही नहीं हैं, इस बात को दमदारी के साथ प्रतिपादित किया हैं. और इसीलिए विभाजन के समय जनसंख्या के अदला-बदली की शर्त को वे अनिवार्य मानते हैं.*






महत्वपूर्ण बात यह हैं की बाद में हिन्दू-मुस्लिम दंगे, बटवारा, आजादी, संविधान का निर्माण इस सब प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद भी इस विषय पर उनकी सोच अडिग हैं. बिलकुल भी नहीं बदली हैं. बटवारे के समय जनसंख्या की अदला-बदली नहीं हो सकी हैं. इसके बावजूद भी बाबासाहब को विभाजन यह एक अच्छी घटना लग रही हैं.
*पाकिस्तान पर पुस्तक प्रकाशित होने के लगभग १५ वर्ष बाद लिखे एक लेख में बाबासाहब ने मुस्लिमों को ‘अभिशाप’ इस शब्द से संबोधित किया हैं.* महाराष्ट्र शासन द्वारा प्रकाशित उनके ‘Dr. Babasaheb Ambedkar – Writing and Speeches’ इस ग्रन्थ साहित्य के पहले खंड के १४६ वे पृष्ठ पर इस सन्दर्भ में बड़ा स्पष्ट उल्लेख हैं. बाबासाहब लिखते हैं - ”When partition took place, I felt that God was willing to lift his curse and let India be one, great and prosperous” (जब विभाजन हुआ, तब मुझे ऐसा लगा, मानो ईश्वर ने इस देश को दिया हुआ ‘अभिशाप’ वापस ले लिया हैं और अब अपने देश को एक रखने का, महान और समृध्दशाली बनने का रास्ता साफ़ हो गया हैं.)
यहां पर ‘अभिशाप’ यह शब्द किस अर्थ में प्रयोग किया गया हैं, यह स्पष्ट हैं. इस्लामी आक्रान्ताओं का इतिहास बाबासाहब को अच्छे से मालूम था. हिन्दू और बौध्द धर्मीय लोगों पर मुसलमानों ने किये हुए पाशविक और बर्बरतापूर्ण अत्याचारों का उनका जबरदस्त अध्ययन था. इन अत्याचारों का वे स्पष्टता के साथ उल्लेख भी कर रहे हैं. अर्थात ‘इस्लामी जनता से अलग होकर ही भारत का विकास हो सकता हैं’, यह उनकी मजबूत धारणा हैं.








ये आगे भी दिखाई देता हैं - उनकी मृत्यु से मात्र छह माह पहले, अर्थात २३ जून, १९५६ को दिल्ली में अखिल भारतीय बौध्दजन समिति के प्रकट सभा में बाबासाहब ने अपने यही विचार स्पष्टता से रखे हैं - “I was glad that India was seperated from Pakistan. I was the philosopher so to say, of Pakistan. I advocated Pakistan because I felt that it was only by partition that Hindus would not only be independent, but free.” 
अपने पाकिस्तान पर लिखे गए पुस्तक में ऊपर कही गयी सभी बातों का विस्तृत विवरण आता हैं. चुंकि बाबासाहब वकील थे, इसलिए उन्होंने ‘पाकिस्तान’ इस विषय के दोनों पक्षों का प्रतिपादन किया हैं.
‘मुस्लिम केस फॉर पाकिस्तान’ इस शीर्षक के अंतर्गत तीन अध्याय हैं. उनमे ‘मुस्लिम लीग की मांगे’, ‘राष्ट्र को घर चाहिए’ और ‘दुर्दशा से पलायन’ जैसे विषयों पर विस्तार से विवेचन किया हैं.
पुस्तक के अगले तीन अध्याय ‘हिन्दू केस अगेंस्ट पाकिस्तान’ इस शीर्षक के अंतर्गत हैं. ‘खंडित एकता’, सुरक्षा की दुर्बलता’ और पाकिस्तान तथा धार्मिक एकता’ इन विषयों द्वारा पाकिस्तान के निर्माण के विरोध में हिन्दू समाज के तर्कों को रखा गया हैं.






आगे ‘पाकिस्तान नहीं बना तो’ इस शीर्षक के अंतर्गत तीन अध्याय हैं. इसमें पाकिस्तान का विकल्प, हिन्दू और मुस्लिमों के दृष्टिकोण से दिया हैं.
अंतिम तीन अध्याय ‘पाकिस्तान के निर्माण की बेचैनी’ इस शीर्षक के अंतर्गत हैं. इनमे सामाजिक मुद्दे, जातिगत संघर्ष, राष्ट्रीय अवसाद आदि विषयों की चर्चा हैं. और सबसे अंत में पूरे पुस्तक का सार, संक्षेप में दिया हैं.




यह पुस्तक अनेक अर्थों में महत्वपूर्ण हैं. यह पुस्तक किसी हिन्दुत्ववादी चिन्तक ने लिखी हुई नहीं हैं. वरन बाबासाहब जैसे अत्यंत कुशाग्र बुध्दी के व्यक्ति ने, हिन्दू - मुस्लिम मसले के सभी पहलुओं पर सारगर्भित विचार कर यह पुस्तक लिखी हैं. इसलिए यह एकपक्षीय होने का प्रश्न ही नहीं उठता. बाबासाहब ने अनेकों बार हिन्दू धर्म पर प्रखर टिप्पणी की हैं. इसलिए ऐसे हिन्दू समाज के पक्षधर न रहने वाले व्यक्ति ने, संविधान के निर्माता ने यह ग्रन्थ लिखा हैं, यह महत्वपूर्ण हैं.
*इस पुस्तक में बाबासाहब लिखते हैं – “ भारत में हिन्दू – मुस्लिम एकता कभी अस्तित्व में ही नहीं थी.* मुसलमान शासक के रूप में भारत में आये थे, इसलिए वे इसी मानसिकता में रहते हैं. १८५७ का विद्रोह भी हिन्दू – मुस्लिम एकता का प्रतीक नहीं था, वरन मुसलमानों ने अपनी ‘छिनी गयी’ शासक की भूमिका को फिर से वापस लेने के लिए अंग्रेजों से छेड़ा विद्रोह था.”
*बाबासाहब मुस्लिम धर्म के बारे में भी विस्तार से लिखते हैं, “मुसलमानों में समता नहीं हैं. इस धर्म में महिलाओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया जाता. मुसलमानों के अलावा वें सभी को काफिर मानते हैं. और ‘मुसलमानों के देश में / समाज में काफिरों के साथ दोयम दर्जे का हीन व्यवहार होना चाहिए’ यह उनके धर्म में ही लिखा हैं.”* इस सन्दर्भ में बाबासाहब ने अनेक उदाहरण दिए हैं. तैमुरलंग की मिसाल देकर वे बताते हैं की उसने कैसे पाशविक अत्याचार हिन्दुओं पर किये थे.
तो फिर ऐसे मुसलमानों के साथ हिन्दुओं की एकता संभव हैं क्या..? अगर हैं, तो कैसे..?








इस बारे में पुस्तक के अंत में बाबासाहब लिखते हैं, “हिन्दू – मुस्लिम एकता यह ‘तुष्टिकरण’ (appeasement) या ‘समझौता’ (settlement) इन दो ही रास्तों से संभव हैं. (If Hindu – Moslem unity is possible, should it be reached by appeasement or settlement..? – Chapter IV, Page 264).
इसमें उल्लेख किया गया तुष्टिकरण (appeasement) यह शब्द बाबासाहब ने मुसलमानों के सन्दर्भ में अनेकों बार प्रयोग किया हैं. *‘कांग्रेस पार्टी मुसलमानों का तुष्टिकरण करती हैं, जो देश के लिए घातक हैं’,* यह कहते हुए बाबासाहब लिखते हैं - Congress has failed to realize is the fact that there is a difference between appeasement and settlement and that the difference is an essential one (Chapter IV, Page 264).
इसी अध्याय में बाबासाहब ‘तुष्टिकरण’ इस शब्द की व्याख्या करते हैं. वे लिखते हैं, “तुष्टीकरण याने आक्रान्ता का दिल जितने के लिए उसने किये हुए खून, बलात्कार, चोरी, डकैती आदि को अनदेखा करना” (Appeasement means to offer to buy off the aggressor bu convincing at or collaborating with him in the rape, murder and arson on innocent Hindus, who happen for the moment to be the victims of his displeasure).
अर्थात ‘कितना भी तुष्टिकरण किया जाय, आक्रांता का कितना भी अनुनय किया जाय, उनकी मांगों का कोई अंत नहीं होता...’








बाबासाहब ने बड़े ही आग्रह के साथ लोकसंख्या के अदला-बदली को प्रतिपादित किया हैं. ‘पूर्व और पश्चिम पाकिस्तान में सभी मुसलमान और हिंदुस्तान में सभी हिन्दू’ यह उनकी पक्की सोच हैं. और पूरी आस्था के साथ उन्होंने अपनी इस राय को बार बार दोहराया हैं.
बाबासाहब की यह राय आगे भी कायम रही हैं. भारत स्वतंत्रता के दहलीज पर हैं, और ऐसे समय, २० जुलाई, १९४७ में प्रकाशित अपने वक्तव्य में बाबासाहब कहते हैं – “बंगाल और पंजाब का विभाजन यह केवल उन प्रान्तों के निवासियों का प्रश्न नहीं हैं. यह राष्ट्रीय प्रश्न हैं. इन प्रान्तों की सीमा रेषा तय करना यह सुरक्षा और व्यवस्थापन इन मुद्दों के आधार पर ही संभव हैं. जनसंख्या के अदला-बदली को यदी कांग्रेस और लीग मानती, तो यह समस्या खड़ी ही नहीं होती. (खंड १७, पृष्ठ ३५५)
बाबासाहब ने १९३६ में धर्मांतर की घोषणा की. घोषणा के पहले और बाद में उन्होंने विभिन्न धर्मोंका बारीकी से अध्ययन किया. इस दौरान हैदराबाद रियासत के नवाब ने उन्हें मुस्लिम धर्म में आने के लिए कुछ करोड़ रुपये पेश किये. (संदर्भ – धनंजय कीर द्वारा लिखित बाबासाहेब आंबेडकर चरित्र) किन्तु बाबासाहब ने यह पेशकश ठुकरा दी.
बाद में बाबासाहब का झुकाव बौध्द धर्म के पक्ष में होने पर उन्होंने ‘बौध्द और इस्लाम’ संबंधों पर विस्तार से लिखा हैं. *इस्लामी आक्रान्ताओं ने कितनी बर्बरता से बौध्द भिक्खुओं को मौत के घाट उतारा, बौध्द विहारों को उध्वस्त किया, इस बारे में बाबासाहब लिखते हैं, “इस्लाम में ‘बुत शिकन’ यह सम्मान से बोला जाने वाला शब्द हैं. इसका अर्थ हैं, ‘मूर्ती फोड़ने वाला’. इसमें जो ‘बुत’ हैं, वह ‘बुध्द’ शब्द का अपभ्रंश (परिवर्तित रूप) हैं.” ‘बौध्द धर्म को समाप्त करने में मुस्लिम आक्रान्ताओं की भूमिका प्रमुख हैं’, ऐसा बाबासाहब ने अनेक स्थानों पर लिखा हैं.*








इस्लाम और पाकिस्तान के बारे में बाबासाहब की सोच ऐसे सीधी, सरल और सपाट हैं. एकदम स्पष्ट. कही कोई संभ्रमावस्था नहीं हैं. जीवन के अलग अलग मुकाम पर भूमिका बदलनेका भी प्रयास नहीं हैं. ‘हिन्दू – मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते इसलिए विभाजन आवश्यक हैं’ ऐसा स्पष्ट प्रतिपादन.
हम बाबासाहब की विभाजन की भूमिका से सहमत होंगे या नहीं होंगे. किन्तु उनकी दूरदृष्टि और सोच की स्पष्टता देखकर मन अचंभित रह जाता हैं..! 





 - प्रशांत पोल

Thursday, 2 February 2017

गांधीवध दिना निमित्त ....


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कुणी वंदा, कुणी निंदा… 
पण एका "महात्म्यानेच" करून ठेवलाय या देशाचा वांदा.
तोच म्हणाला होता की "हिंदू - मुस्लिम" भाऊ भाऊ….

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असेच जर होते तर त्यांनी मुस्लिमांना का केले पाकिस्तान देऊ???
एका "पंडितलाच" जर करायचे होते पंतप्रधान तर अखंड भारताचाच केला असता…
काश्मीर मधलाही हिंदू पंडित मग भारतात असा निर्वासित झाला नसता. 

खेळली असती कि दोन्ही "भावंडे"(?) खेळीमेळीने - गुण्या गोविंदाने…
गेले नसते घडवले मग बॉम्बस्फोट देशात गुरु अफजल, सालेम अन दाऊद ने.  
ओवैसी बंधुनीही मग श्रीराम धून अन वन्दे मातरम मनापासून गायलं असतं….
                                           Image result for gandhi
घेऊन हातात भगवं निशाण यांनीही गगनी उंच फडकावलं असतं.
"महात्म्या" अरे तू छत्रपति अन महाराणाना जर पथभ्रष्ट म्हटलं नसतं….,
भगतसिंहाच्या फाशीच्या वेळेस इंग्रजांना धारेवर धरलं असतं…,
खिलाफत चळवळीचं स्तोम भारतात माजवलं नसतं…,

अब्दुल रशीद प्रमाणेच श्रद्धानंदनाही तु  "भाऊ" म्हटलं असतं…,
मोपल्यांनी केलेल्या बंडाच्या वेळेस जर हिंदूंसाठी उपोषण केलं असतं… ,
"देश तोडण्याआधी माझे तुकडे करा" हे मागणं रेटून धरलं असतं…,
तर नथुरामनेही तुझ्या अंगावर कधीच पिस्तुल ताणलं नसतं…

अन आम्हीही तुला मनापासूनच "महात्मा" मानलं असतं.
कुणी वंदा, कुणी निंदा… 
पण एका "महात्म्यानेच" करून ठेवलाय या देशाचा वांदा.
🚩🚩🚩


संत सखुसाठी देव सखू जाहला .....!

((((((((( भक्त सखुबाई )))))))))



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महाराष्ट्र में कृष्णा नदी के किनारे करहाड़ नामक एक स्थान है, वहाँ एक ब्राह्मण रहता था
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Image result for bhakt sakhubaiउसके घर में चार प्राणी थे- ब्राह्मण, उसकी स्त्री, पुत्र और साध्वी पुत्रवधू।
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ब्राह्मण की पुत्रवधू का नाम था ‘सखूबाई’।
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सखूबाई जितनी अधिक भक्त, आज्ञा कारिणी, सुशील, नम्र और सरल हृदय थी उसकी सास उतनी ही अधिक दुष्टा, अभिमानी, कुटिला और कठोर हृदय थी।
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पति व पुत्र भी उसी के स्वभाव का अनुसरण करते थे।
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सखूबाई सुबह से लेकर रात तक बिना थके-हारे घर केे सारे काम करती थी।
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शरीर की शक्ति से अधिक कार्य करने के कारण अस्वस्थ रहती, फिर भी वह आलस्य का अनुभव न करके इसे ही अपना कर्तव्य समझती।
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मन ही मन भगवान् के त्रिभुवन स्वरूप का अखण्ड ध्यान और केशव, विठ्ठल, कृष्ण गोविन्द नामों का स्मरण करती रहती।
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दिन भर काम करने के बाद भी उसे सास की गालियाँ और लात-घूंसे सहन करने पड़ते।
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पति के सामने दो बूँद आँसू निकालकर हृदय को शीतल करना उसके नसीब में ही नहीं था।
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कभी-कभी बिना कुसूर के मार गालियों की बौछार उसके हृदय में शूल की तरह चुभती थी
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परन्तु अपने शील स्वभाव के कारण वह सब बातें पल में ही भूल जाती।
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इतना होने पर भी वह इस दुःख को भगवान् का आशीर्वाद समझकर प्रसन्न रहती और सदा कृतज्ञता प्रकट करती कि मेरे प्रभु की मुझ पर विशेष कृपा है
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जो मुझे ऐसा परिवार दिया वरना सुखों के बीच में रहकर मैं उन्हें भूल जाती और मोह वश माया जाल में फँस जाती।
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एक दिन एक पड़ोसिन ने उसकी ऐसी दशा को देखकर कहा- ‘‘क्या तेरे नेहर में कोई नहीं है जो तेरी खोज ख़बर ले’।
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उसने कहा ‘‘मेरा नेहर पण्ढ़रपुर है, मेरे माँ-बाप रुक्मिणी-कृष्ण हैं।
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एक दिन वे मुझे अपने पास बुलाकर मेरा दुःख दूर करेंगे।’’
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सखूबाई घर के काम ख़त्म कर कृष्णा नदी से पानी भरने गयी, तभी उसने देखा कि भक्तों के दल नाम-संकीर्तन करते हुए पण्ढ़रपुर जा रहे हैं
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एकादशी के दिन वहाँ बड़ा भारी मेला लगता है।
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उसकी भी पण्ढ़रपुर जाने की प्रबल इच्छा हुई पर घरवालों से आज्ञा का मिलना असम्भव जान कर वह इस संत मण्डली के साथ चल दी।
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यह बात एक पड़ोसिन ने उसकी सास को बता दी।
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माँ के कहने पर पुत्र घसीटते हुए सखू को घर ले आया और उसे रस्सी से बाँध दिया,
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परन्तु सखू का मन तो प्रभु के चरणों में ही लगा रहा।
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वह प्रभु से रो-रोकर दिन-रात प्रार्थना करती रही, क्या मेरे नेत्र आपके दर्शन के बिना ही रह जायेंगे ?
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कृपा करो नाथ ! मैंने अपने को तुम्हारे चरणों मे बाँधना चाहा था, परन्तु बीच में यह नया बंधन कैसे हो गया ?
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मुझे मरने का डर नहीं है पर सिर्फ़ एक बार आपके दर्शन की इच्छा है।
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मेरे तो माँ-बाप, भाई, इष्ट-मित्र सब कुछ आप ही हो , मैं भली-बुरी जैसी भी हूँ, तुम्हारी हूँ।
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सच्ची पुकार को भगवान् अवश्य सुनते हैं और नकली प्रार्थना का जवाब नहीं देते।
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असली पुकार चाहे धीमी हो, वह उनके कानों तक पहुँच जाती है।
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सखू की पुकार को सुनकर भगवान् एक स्त्री का रूप धारण कर उसके पास आकर बोले-
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मैं तेरी जगह बँध जाऊँगी, तू चिन्ता मत कर।
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यह कहकर उन्होंने सखू के बंधन खोल दिये और उसे पण्ढ़रपुर पहुँचा दिया।
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इधर सास-ससुर रोज़ उसके पास जाकर खरी-खोटी सुनाते, वे सब सह जाती।
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जिनके नाम स्मरण मात्र से माया के दृढ़ बन्धन टूट जाते हैं, वे भक्त के लिए सारे बंधन स्वीकार करते हैं।
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आज सखू बने भगवान् को बँधे दो हफ्ते हो गये
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उसकी ऐसी दशा देखकर पति का हृदय पसीज गया। उसने सखू से क्षमा माँगी और स्नान कर भोजन के लिए कहा। आज प्रभु के हाथ का भेाजन कर सबके पाप धुल गये।
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उधर सखू यह भूल गयी कि उसकी जगह दूसरी स्त्री बँधी है। उसका मन वहाँ ऐसा लगा कि उसने प्रतिज्ञा की कि शरीर में जब तक प्राण हैं, वह पण्ढ़रपुर में ही रहेगी।
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प्रभु के ध्यान में उसकी समाधि लग गयी और शरीर अचेत हो ज़मीन पर गिर पड़ा। गाँव के लोगों ने उसका अंतिम संस्कार कर दिया
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माता रुक्मिणी को चिन्ता हुई कि मेरे स्वामी सखू की जगह पर बहू बने हैं।
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उन्होंने शमशान पहुँचकर सखू की अस्थियों को एकत्रित कर उसे जीवित किया और सब स्मरण कराकर करहड़ जाने की आज्ञा दी।
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करहड़ पहुँचकर जब वह स्त्री बने प्रभु से मिली तो उसने क्षमा-याचना की।
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जब घर पहुँची तो सास-ससुर के स्वभाव में परिवर्तन देखकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ।
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दूसरे दिन एक ब्राह्मण सखू के मरने का समा चार सुनाने करहड़ आया और सखू को काम करते देख उसे बड़ा आश्चर्य हुआ।                                                 
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उसने सखू के ससुर से कहा- ‘‘तुम्हारी बहू तो पण्ढ़रपुर में मर चुकी थी।
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पति ने कहा- ’’सखू तो पण्ढ़रपुर गयी ही नहीं, तुम भूल से ऐसा कहते हो।
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जब सखू से पूछा तो उसने सारी घटना सुना दी। सभी को अपने कुकृत्यों पर पश्चाताप हुआ।
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अब सब कहने लगे कि निश्चित ही वे साक्षात् लक्ष्मीपति थे, हम बड़े ही नीच और भक्ति हीन हैं।
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हमने उनको न पहचानकर व्यर्थ ही बाँधे रखा और उन्हें न मालूम कितने क्लेश दिये।Image result for bhakt sakhubai
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अब तीनों के हृदय शुद्ध हो चुके थे और उन्होंने सारा जीवन प्रभु भक्ति में लगा दिया।
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प्रभु अपने भक्तों के लिए क्या कुछ नहीं करते।
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   ((((((((( जय जय श्री राधे )))))))))
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